
नयी दिल्ली 22 जनवरी । भारत तेजी से प्रगति करने वाला विकासशील देश है, लेकिन इसका विकास समावेशी, न्यायसंगत व पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ है ।
श्री सिंह ने बुधवार को केरल के पथानामथिट्टा जिले में प्रसिद्ध लेखिका और पर्यावरणविद् सुगाथाकुमारी की 90वीं जयंती समारोह के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में यह बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश का उपभोग जरूरत आधारित होना चाहिए न कि लालच आधारित, उन्होंने कहा कि स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए व्यवहार में बदलाव की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ‘उपयोग करो और खत्म करो’ की अर्थव्यवस्था से निजात पाने की जरूरत है।
रक्षा मंत्री ने सुगाथाकुमारी को न केवल एक कवि बल्कि समाज की अंतरात्मा की रक्षक के रूप में वर्णित किया क्योंकि भावनात्मक सहानुभूति, मानवतावादी संवेदनशीलता और नैतिक सतर्कता से ओतप्रोत उनका काम सामाजिक और पर्यावरणीय चिंताओं को दूर करने का एक माध्यम बन गया। उन्होंने कहा कि केरल में, जो अपनी हरियाली और नदियों के लिए जाना जाता है, वह पारिस्थितिकी तंत्र की एक प्रखर रक्षक के रूप में उभरी और ‘साइलेंट वैली बचाओ’ आंदोलन में उनका उल्लेखनीय योगदान पर्यावरण सक्रियता के इतिहास में एक निर्णायक क्षण था। श्री सिंह ने बताया कि भारत के संविधान निर्माता महान पूर्वजों के विचारों और प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान से अवगत थे, यही वजह है कि पर्यावरण की रक्षा, सुधार और सुरक्षा के लिए एक निर्देश स्थापित किया गया था। उन्होंने आगे कहा कि भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों का मौलिक कर्तव्य बनाया है कि वे प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करें और जीवित प्राणियों के प्रति दया रखें। उन्होंने कहा, “मानवता को प्राकृतिक संसाधनों का ट्रस्टी होना चाहिए, लेकिन कभी मालिक नहीं होना चाहिए। प्रकृति का कभी भी शोषण नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसका सम्मान, पूजा और बिना बर्बादी के उपयोग किया जाना चाहिए। हम, मनुष्य के रूप में, बुद्धिमान प्रजाति होने चाहिए। लेकिन हमने अपनी यात्रा में कई गलत मोड़ लिए। शुक्र है कि हमारे पास सुगाथा कुमारी जी जैसे लोग थे जिन्होंने माँ प्रकृति की अपने सच्चे बच्चे की तरह सेवा की।”
रक्षा मंत्री ने सरकार द्वारा की गई हरित पहलों का भी उल्लेख किया।