
नयी दिल्ली, 21 मई । नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और जाने-माने अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने रिजर्व बैंक को गिरते रुपये को संभालने के लिए हस्तक्षेप न करने और 100 रुपये प्रति डॉलर के आंकड़े से न घबराने की सलाह दी है।श्री पनगढ़िया ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट की एक सीरीज में लिखा, “एक डॉलर = 100 रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर को अपनी नीति प्रतिक्रिया निर्धारित न करने दें क्योंकि 100 भी सिर्फ एक संख्या है, जैसे 99 और 101 हैं। चाहे कच्चे तेल की कमी अल्पकालिक हो या दीर्घकालिक, इस समय सही प्रतिक्रिया रुपये को गिरने देना है।”
इसके बाद उन्होंने बताया है कि यदि कच्चे तेल की कमी अल्पकालिक (तीन महीने से एक साल की) है तो रुपया तत्काल भले कमजोर होगा लेकिन बाद में कच्चे तेल में नरमी के बाद काफी हद तक वापसी कर लेगा। इससे विदेशी निवेशक भी “सस्ते” रुपये का लाभ उठाने के लिए भारत में निवेश करेंगे।कच्चे तेल की दीर्घकालिक कमी की स्थिति में उनका मानना है कि रुपये के अवमूल्यन के अलावा कोई दूसरा उपाय घाटे का सौदा साबित होगा। रुपये को बचाने की कोशिश में विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घटता जायेगा, लेकिन उसका कोई लाभ नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि डॉलर में बॉन्ड जारी करना या प्रवासी भारतीयों से उच्च ब्याज दर पर जमा स्वीकार करना अस्थायी राहत से अधिक कुछ भी नहीं होंगे क्योंकि उनसे प्राप्त विदेशी मुद्रा से देश की जितनी कमाई होगी उससे ज्यादा ब्याज में खर्च करना पड़ेगा। अंततः एक डॉलर = 100 रुपये की मनोवैज्ञानिक बाधा को पार करना ही पड़ेगा।श्री पनगढ़िया ने कहा कि अब साल 2013 जैसी स्थिति नहीं है, जब मुद्रास्फीति ऊंचे दहाई दर में होती थी। मौजूदा अर्थव्यवस्था रुपये के अवमूल्यन के साथ आने वाले कुछ मुद्रास्फीति के दबाव को सहन की क्षमता रखती है।