रसोई गैस की किल्लत ने अंगीठी को दिया किचेन में प्रवेश का मौका

रसोई गैस की किल्लत ने अंगीठी को दिया किचेन में प्रवेश का मौका

जालौन 27 मई । रसोई गैस के वैश्विक संकट के चलते लुप्त प्राय: हो चुकी अंगीठी एक बार फिर मध्यम और निम्न वर्ग के लोगों के रसोई घर में प्रवेश करने लगी है।अस्सी के दशक तक रसोई घर में मिट्टी के चूल्हे और लोहे की अंगीठियां भोजन पकाने का मुख्य साधन हुआ करती थीं। सुबह होते ही घरों के आंगन से उठता धुआं और जलती लकड़ियों की महक ग्रामीण जीवन की पहचान मानी जाती थी। समय बदला, आधुनिकता आई और रसोई में एलपीजी गैस सिलेंडर ने चूल्हे की जगह ले ली। लोगों ने इसे सुविधाजनक और समय बचाने वाला विकल्प माना लेकिन अब गैस सिलेंडर की लगातार बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर लोगों को पुराने दिनों की याद दिला दी है।अमर सिंह चंदेल बताते हैं कि आज कई परिवार, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, गैस के बढ़ते खर्च से परेशान होकर फिर से अंगीठी और चूल्हे का सहारा लेने लगे हैं। गांवों में सुबह-शाम कई घरों के बाहर फिर से चूल्हों में आग जलती दिखाई देने लगी है। कुछ परिवार गैस का उपयोग सीमित कर रहे हैं और दैनिक भोजन बनाने के लिए लकड़ी, उपले और कोयले की अंगीठी का प्रयोग कर रहे हैं।

नीलम, माया,शीला,कमल,आदि ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि पहले पूरा परिवार चूल्हे पर बना भोजन खाता था। उस समय भोजन का स्वाद भी अलग होता था और खर्च भी कम पड़ता था। अब गैस सिलेंडर भरवाने में एकमुश्त बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है, जिससे सीमित आय वाले परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ जाता है। ऐसे में कई लोग पारंपरिक साधनों की ओर लौटने को मजबूर हैं।

अंगीठी और चूल्हे की वापसी के पीछे केवल आर्थिक कारण ही नहीं हैं। कई लोगों का मानना है कि मिट्टी के चूल्हे पर बनी रोटी, दाल और सब्जी का स्वाद गैस पर बने भोजन से बेहतर होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी त्योहारों, विवाह समारोहों और विशेष अवसरों पर चूल्हे पर भोजन बनाने की परंपरा जीवित है। अब यह परंपरा फिर से सामान्य दिनों की रसोई तक पहुंचती दिखाई दे रही है।

अशोक कुमार, कल्लू काशीखेड़ा,बुजुर्ग बताते हैं कि पुराने समय में चूल्हा केवल भोजन पकाने का साधन नहीं था, बल्कि परिवार और सामाजिक जीवन का केंद्र भी था। सर्दियों में लोग अंगीठी के आसपास बैठकर बातचीत करते थे और परिवार के सदस्य एक साथ समय बिताते थे। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में यह संस्कृति धीरे-धीरे खत्म हो गई थी, लेकिन अब परिस्थितियां लोगों को फिर उसी ओर ले जा रही हैं।

हालांकि मानना है कि चूल्हे और अंगीठी के अत्यधिक उपयोग से धुएं के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं। इसलिए इनके उपयोग के दौरान उचित वेंटिलेशन और सावधानियां आवश्यक हैं। वहीं कई लोग आधुनिक और पारंपरिक साधनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं। वे गैस का उपयोग आवश्यक कार्यों के लिए करते हैं और अन्य भोजन चूल्हे या अंगीठी पर तैयार करते हैं।

गैस की बढ़ती कीमतों और महंगाई के दौर में यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि पुरानी परंपराएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। परिस्थितियों के अनुसार वे फिर से जीवन का हिस्सा बन सकती हैं। अंगीठी और चूल्हा केवल बीते समय की याद नहीं, बल्कि आज भी लाखों परिवारों के लिए एक व्यवहारिक विकल्प बने हुए हैं।

महंगाई के इस दौर में जब हर परिवार अपने खर्चों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है, तब चूल्हे और अंगीठी की वापसी यह संकेत देती है कि परंपरागत जीवनशैली की उपयोगिता आज भी बरकरार है। बदलते समय के साथ पुरानी रसोई संस्कृति एक बार फिर लोगों के घरों और यादों में अपनी जगह बनाती नजर आ रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *