दिव्यांका त्रिपाठी, जूही परमार और श्रद्धा आर्या ने आधुनिक मातृत्व पर महाभारत की कालातीत सीखों के जरिए साझा किए अपनेअनुभव

दिव्यांका त्रिपाठी, जूही परमार और श्रद्धा आर्या ने आधुनिक मातृत्व पर महाभारत की कालातीत सीखों के जरिए साझा किए अपनेअनुभव

मुंबई, 29 मई। लोकप्रिय टेलीविज़न अभिनेत्रियाँ दिव्यांका त्रिपाठी, जूही परमार और श्रद्धा आर्या हाल ही में एक साथ आईं और साझा किया कि किस तरह महाभारत की कहानियाँ और किरदार उनकी माँ बनने और पैरेंटिंग की यात्रा से गहराई से जुड़ते हैं। दिल से निकले उनके विचारों ने यह दिखाया कि कुंती, गांधारी और गुरु द्रोणाचार्य की कहानियाँ आज भी आधुनिक पैरेंटिंग के फैसलों को प्रेरित करती हैं।दिव्यांका त्रिपाठी ने आज की दुनिया में लगातार होने वाली तुलना के दबाव, खासकर मातृत्व और बच्चों को लेकर, अपनी भावनाएँ साझा करते हुए कहा, “आजकल तुलना बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू हो जाती है। एक माँ के तौर पर यह सोच मुझे सच में डराती है। मैं अक्सर सोचती हूँ कि अपने बच्चे को हर कदम पर तुलना और जजमेंट से भरी इस दुनिया से कैसे बचाऊँगी। इस पर विचार करते हुए मुझे कुंती की याद आई। उन्होंने कभी अपने बच्चों की आपस में तुलना नहीं की। बल्कि हर बच्चे की अलगअलग खूबियों को पहचाना – युधिष्ठिर की बुद्धिमत्ता, भीम की ताकत, अर्जुन का ध्यान, नकुल और सहदेव का संतुलन और प्यार – और हर बच्चे को अलग तरह से सँवारा। मेरे लिए यही असली पैरेंटिंग है। जब हर बच्चे को उसका सर्वश्रेष्ठ बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो तुलना अपने आप गायब हो जाती है और उसकी जगह प्यार ले लेता है।”

जूही परमार ने आज के डिजिटल दौर में पैरेंटिंग पर अपने विचार साझा करते हुए कहा, “लोगों को मेरे और समायरा के साथ बनाए गए रील्स बहुत पसंद आते हैं और सच कहूँ तो हमारा रिश्ता बहुत खूबसूरत है। हम दोस्त की तरह मज़े करते हैं, साथ घूमते हैं और अनगिनत यादें बनाते हैं। लेकिन असली पैरेंटिंग सिर्फ रील्स तक सीमित नहीं है। जैसेजैसे बच्चे बड़े होते हैं, माँ को दोस्त भी बनना पड़ता है और रक्षक भी। महाभारत से मैंने एक अहम सीख ली है कि पैरेंट्स बच्चों को पालते समय ‘गांधारी जैसी पट्टी’ नहीं बाँध सकते। दुर्योधन में गुणों की कमी नहीं थी, लेकिन गलत संगत और सही मार्गदर्शन की कमी ने उसे बदल दिया। इसी वजह से मुझे लगता है कि हर पैरेंट को भावनात्मक रूप से जागरूक रहना चाहिए, अपने बच्चे की दुनिया को समझना चाहिए और हर कदम पर उसके साथ खड़ा रहना चाहिए।”श्रद्धा आर्या ने मातृत्व के इर्दगिर्द लगातार आती राय और सुझावों के शोर पर अपने विचार साझा करते हुए कहा, “हर नई माँ इस बात से सहमत होगी कि ‘कांग्रैचुलेशन्स’ से लेकर अनगिनत सुझावों तक का सफर बहुत जल्दी शुरू हो जाता है। खाने की पसंद से लेकर कपड़ों की सलाह तक, अचानक हर किसी की राय बनने लगती है। एक दिन मैंने खुद से पूछा कि इस सारे शोर के बीच मेरे और मेरे बच्चे के लिए सबसे ज़रूरी क्या है। तभी मुझे गुरु द्रोणाचार्य की प्रसिद्ध परीक्षा याद आई, जहाँ उन्होंने राजकुमारों से पूछा कि पक्षी पर निशाना लगाते समय वे क्या देख रहे हैं। सबने अलगअलग चीज़ें देखीं, लेकिन अर्जुन ने सिर्फ पक्षी की आँख देखी। वही ध्यान मेरे साथ रह गया। मुझे एहसास हुआ कि माँ बनने के लिए भी ऐसी ही स्पष्टता चाहिए। राय, टिप्पणियों और ध्यान भटकाने वाली चीज़ों से भरी दुनिया में कभीकभी माँ को बाहरी शोर को अनदेखा कर अपने दिल की आवाज़ पर पूरा भरोसा करना पड़ता है।

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