
अलवर, 05 जून । मौजूदा दौर में जब अधिकतर लोग मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में व्यस्त हैं उसी समय राजस्थान में खैरथल तिजारा जिले के पेहल गांव का एक साधारण ग्रामीण पिछले 46 वर्षों से धरती को हरा-भरा बनाने के अभियान में जुटा हुआ है।उसके पास कोई आधुनिक संसाधन हैं, न प्रचार-प्रसार का कोई माध्यम और उन्होंने कभी मोबाइल फोन का इस्तेमाल कभी नहीं किया है। उनकी पहचान केवल एक है, “पेड़ों के प्रति अटूट प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का जुनून।”
यह कहानी है सुरेंद्र सैन उर्फ बंटी की है जिन्हें क्षेत्र में लोग सम्मानपूर्वक ‘ट्री-मैन’ के नाम से जानते हैं। उन्होंने अब तक पहल गांव की पहाड़ियों के अलावा हरियाणा के कई गांव में एक लाख 10 हजार से अधिक पौधे लगाकर उन्हें वृक्षों का रूप दिया है। उन्होंने बताया “जो भी पेड़ लगाने के लिए सहायता मांगता है मैं वही चला जाता हूं और उसकी देखभाल भी मुझे करनी पड़ती है।” उन्होंने अफसोस व्यक्त किया कि कई बार जिला प्रशासन स्थानीय प्रशासन और वन विभाग से पेड़ों की सुरक्षा के लिए टी गार्ड सहित अन्य सहायता मांगी गयी लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया।
सुरेंद्र ने बताया कि उन्हें अपने गुरु संत घीसा दास जी महाराज का सान्निध्य मिला। गुरु ने उन्हें प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझाया। इसी प्रेरणा से महज आठ वर्ष की आयु में उसने पहला पौधा लगाया। समय के साथ यह शौक नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य बन गया। अब भी वह प्रतिदिन घंटों तक पौधों की देखभाल में जुटे रहते हैं और पर्यावरण संरक्षण को अपना सबसे बड़ा धर्म मानते हैं।
सुरेंद्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अधिकतर पौधे स्वयं तैयार करते हैं। पौधों को तैयार करने के बाद उन्हें कंधों पर उठाकर कई किलोमीटर दूर पहाड़ी और चट्टानी क्षेत्रों तक पहुंचाते हैं, जहां हरियाली की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। उनके लगाए गए हजारों पौधे अब विशाल वृक्ष बन चुके हैं और लोगों को छाया, ऑक्सीजन पर्यावरणीय सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं।
गर्मी के मौसम में जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, तब भी सुरेंद्र का अभियान नहीं रुकता। कई बार वह अपने घर से 10 किलोमीटर दूर तक पानी लेकर जाते हैं और दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़कर पौधों को सींचते हैं। वह बताते हैं कि पौधा लगाना आसान है, लेकिन उसे वृक्ष बनने तक जीवित रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। यही कारण है कि उनके लगाए गए पौधों की जीवित रहने की दर काफी अधिक है। पेहल गांव और आसपास के जिन क्षेत्रों में कभी केवल पत्थर, झाड़ियां और बंजर भूमि दिखाई देती थी, वहां अब हरियाली की सुंदर तस्वीर दिखाई देती है।सुरेंद्र ने स्कूलों, अस्पतालों, पुलिस थानों, श्मशान घाटों, मंदिर परिसरों, सार्वजनिक पार्कों और सड़क किनारे हजारों पौधे लगाए हैं। उनके अथक प्रयासों ने कई क्षेत्रों की तस्वीर बदल दी है।सुरेंद्र केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वह गांव-गांव जाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रहे हैं। स्कूलों में बच्चों को पौधारोपण के लिए प्रेरित करते हैं और युवाओं को हरियाली अभियान से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि हर व्यक्ति अपने जीवन में कम से कम पांच पौधे लगाकर उनकी जिम्मेदारी ले ले, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सुरेंद्र सैन को जिला प्रशासन और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार तब होता है जब उनके लगाए पौधे विशाल वृक्ष बनकर लोगों को छाया देते हैं। सुरेंद्र ने कहा, “पेड़ लगाना आसान है, लेकिन उसे वृक्ष बनने तक संभालना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। मेरा सपना है कि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा और हरा-भरा वातावरण मिले। सरकार अच्छे बीज और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए तो पर्यावरण संरक्षण के कार्य को और गति मिल सकती है।”स्थानीय सामाजिक और धार्मिक संगठनों का मानना है कि चार दशक से अधिक समय से पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे सुरेंद्र सैन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए। लोगों का कहना है कि उनके समर्पण, संघर्ष और पर्यावरण के प्रति असाधारण योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया जाना चाहिए।