
इटावा, 10 जून । उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में फिशर वन क्षेत्र में स्थित मुगल बादशाह मोहम्मद गौरी के सेनापति शमसुद्दीन से जुड़ी बताई जाने वाली मजार के खिलाफ वन विभाग ने बुधवार को ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू कर दी। वन विभाग ने संबंधित पक्षों द्वारा भूमि से जुड़े वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाने के आधार पर मजार को अवैध मानते हुए यह कार्रवाई की है।जिला वन अधिकारी (डीएफओ) विकास नायक ने बताया कि फिशर वन क्षेत्र में स्थित उक्त मजार को वन विभाग की न्यायिक प्रक्रिया के बाद अवैध घोषित किया गया था, जिसके उपरांत इसे हटाने की कार्रवाई आधिकारिक रूप से शुरू कर दी गई है।
उन्होंने बताया कि मजार के देखरेखकर्ता फजले इलाही को नोटिस जारी कर भूमि संबंधी अभिलेख प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया था, लेकिन वैध दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके। इसके बाद मजार को ध्वस्त करने के आदेश जारी किए गए। इस आदेश के विरुद्ध कानपुर स्थित वन संरक्षक के समक्ष अपील दायर की गई थी, जिसे खारिज कर दिया गया।वन विभाग के अनुसार, इस मामले की सुनवाई जनवरी माह में शुरू हुई थी। 23 जनवरी को वन विभाग ने मजार परिसर में धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगा दी थी तथा संरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण का मामला दर्ज करते हुए वन न्यायालय में ध्वस्तीकरण वाद दायर किया था।
मामले की पहली सुनवाई 5 फरवरी को हुई, जिसमें पक्षकारों ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। इसके बाद न्यायालय ने क्रमशः 16 फरवरी, 20 फरवरी, 23 मार्च और 28 मार्च तक दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया। वन न्यायालय ने 28 मार्च को भूमि संबंधी साक्ष्य प्रस्तुत करने का अंतिम अवसर प्रदान किया था, लेकिन संबंधित पक्ष कोई वैध अभिलेख प्रस्तुत नहीं कर सके।डीएफओ विकास नायक ने बताया कि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के अनुसार भारत सरकार की पूर्व अनुमति के बिना वन भूमि का उपयोग गैर-वानिकी कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि वर्ष 1916, 1936 और 1946 के राजपत्रों के अनुसार संबंधित भूमि वन विभाग के स्वामित्व में दर्ज है और उस पर किसी भी प्रकार का गैर-वानिकी निर्माण अवैध है।
इस मामले को लेकर विश्व हिंदू परिषद के इटावा जिला अध्यक्ष अमित दीक्षित ने जनवरी माह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शिकायत की थी। उन्होंने वन विभाग की कार्रवाई का स्वागत करते हुए कहा कि उनकी शिकायत के तथ्यों की पुष्टि होने के बाद ही विभाग को यह कदम उठाना पड़ा।स्थानीय स्तर पर यह मजार ‘बीहड़ वाले सैयद बाबा’ के नाम से भी जानी जाती रही है। यहां प्रतिवर्ष उर्स का आयोजन किया जाता था और प्रत्येक गुरुवार को बड़ी संख्या में लोग अकीदत प्रकट करने पहुंचते थे। हालांकि, वन विभाग द्वारा जनवरी में ही धार्मिक आयोजनों और आवागमन पर रोक लगा दी गई थी, जिसके चलते इस वर्ष प्रस्तावित उर्स का आयोजन नहीं हो सका।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि फिशर वन क्षेत्र में मजार का निर्माण कब और किन परिस्थितियों में हुआ, इसके संबंध में उनके पास कोई आधिकारिक अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं।स्थानीय स्तर पर प्रचलित ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, वर्ष 1194 में मोहम्मद गौरी की सेना और कन्नौज के राजा जयचंद के सेनापति के बीच हुए युद्ध में शमसुद्दीन नामक सेनापति की मृत्यु हुई थी। हालांकि, फिशर वन क्षेत्र में स्थित इस मजार का उनसे प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने वाले आधिकारिक ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
वन विभाग ने मजार तक पहुंचने वाले मार्गों को अवरुद्ध करने के लिए पूर्व में कई स्थानों पर कटान भी कराया था। बुधवार को शुरू हुई बुलडोजर कार्रवाई के दौरान मजार के आसपास स्थित संरचनाओं के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया तथा वहां जाने वाले रास्तों को भी तोड़ दिया गया।अधिकारियों का कहना है कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई चरणबद्ध तरीके से जारी रहेगी और निर्धारित प्रक्रिया के तहत शेष निर्माण को भी हटाया जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।