
मुंबई, 21 जून। हिंदी सिनेमा में जब-जब फिल्मों में पिता के चरित्र को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है, दर्शकों ने उसे भरपूर प्यार और सम्मान दिया है। कभी अनुशासन और आदर्शों का प्रतीक, कभी त्याग और संघर्ष की प्रतिमूर्ति तो कभी बच्चों के सपनों को अपने कंधों पर उठाने वाले मार्गदर्शक के रूप में बॉलीवुड ने पिता के किरदार को कई रंगों में प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि जब भी किसी फिल्म में पिता का चरित्र कहानी का मजबूत आधार बना, दर्शकों ने उसे भरपूर प्यार और सम्मान दिया।भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में पिता की भूमिका परिवार के मुखिया, अनुशासनप्रिय अभिभावक और मूल्यों के संरक्षक के रूप में दिखाई जाती थी।
पिता-पुत्र के रिश्ते को सबसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वाली फिल्मों में वर्ष 1951 में प्रदर्शित ‘आवारा’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। फिल्म में पृथ्वीराज कपूर और राज कपूर ने वास्तविक जीवन की तरह पर्दे पर भी पिता-पुत्र की भूमिका निभाई थी। न्यायाधीश रघुनाथ और उनके पुत्र राज के बीच का वैचारिक संघर्ष फिल्म की मुख्य धुरी था। यह फिल्म भारतीय सिनेमा की कालजयी कृतियों में गिनी जाती है।पृथ्वीराज कपूर ने वर्ष 1960 में प्रदर्शित के. आसिफ निर्देशित ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ में सम्राट अकबर की भूमिका निभाकर पिता के किरदार को एक नई ऊंचाई दी थी। फिल्म में उन्होंने अभिनेता दिलीप कुमार द्वारा निभाए गए शहजादे सलीम के पिता की भूमिका निभाई थी। अकबर केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि एक ऐसे पिता के रूप में भी नजर आते हैं जो अपने पुत्र से बेहद प्रेम करता है, लेकिन राजधर्म और साम्राज्य की मर्यादा को सर्वोपरि मानता है।
पृथ्वीराज कपूर और दिलीप कुमार के बीच फिल्माए गए कई दृश्य हिंदी सिनेमा के इतिहास में आज भी याद किए जाते हैं। खासकर वे प्रसंग, जिनमें अकबर अपने पुत्र के विद्रोह का सामना एक बादशाह के रूप में करता है, लेकिन भीतर से एक पिता की पीड़ा भी झेलता है। पृथ्वीराज कपूर की दमदार आवाज और प्रभावशाली अभिनय तथा दिलीप कुमार की संजीदा अदाकारी ने पिता-पुत्र के इस संघर्ष को बेहद जीवंत बना दिया। यही कारण है कि ‘मुगल-ए-आज़म’ को भारतीय सिनेमा में पिता-पुत्र संबंधों को सबसे प्रभावशाली ढंग से चित्रित करने वाली फिल्मों में गिना जाता है।वर्ष 1971 में प्रदर्शित ‘कल आज और कल’ हिंदी सिनेमा की एक अनोखी फिल्म थी, जिसमें कपूर परिवार की तीन पीढ़ियां पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर और रणधीर कपूर एक साथ नजर आई थीं। फिल्म में बदलते समय के साथ पिता-पुत्र के रिश्तों में आने वाले बदलाव को रोचक ढंग से दिखाया गया था।
पिता-पुत्र के संघर्ष को सबसे सशक्त रूप से प्रस्तुत करने वाली फिल्मों में ‘शक्ति’ का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।वर्ष 1982 में प्रदर्शित रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शक्ति’ में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने पिता-पुत्र की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म में हिंदी सिनेमा के दो महान कलाकार दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन पहली बार आमने-सामने नजर आए थे। दिलीप कुमार ने ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी अश्विनी कुमार की भूमिका निभाई थी, जबकि अमिताभ बच्चन उनके पुत्र विजय के किरदार में थे। फिल्म का चरमोत्कर्ष हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार दृश्यों में गिना जाता है, जब कानून की रक्षा के लिए अश्विनी कुमार को अपने ही पुत्र के खिलाफ हथियार उठाना पड़ता है। इस दृश्य में एक पुलिस अधिकारी के कर्तव्य और एक पिता की ममता के बीच का संघर्ष बेहद मार्मिक ढंग से सामने आता है।दिलीप कुमार ने अश्विनी कुमार के किरदार में संयम, दृढ़ता और भावनात्मक गहराई का शानदार प्रदर्शन किया, वहीं अमिताभ बच्चन ने उपेक्षा और विद्रोह से भरे पुत्र विजय की भूमिका को जीवंत कर दिया। दोनों दिग्गज कलाकारों की अभिनय प्रतिभा ने ‘शक्ति’ को भारतीय सिनेमा में पिता-पुत्र संबंधों पर बनी सबसे सशक्त और यादगार फिल्मों में शामिल कर दिया। आज भी यह फिल्म इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि पिता का प्रेम कभी कम नहीं होता, भले ही परिस्थितियां उसे कठोर निर्णय लेने के लिए मजबूर कर दें।वर्ष 1983 में प्रदर्शित ‘मासूम’ में नसीरुद्दीन शाह ने एक ऐसे पिता की भूमिका निभाई, जो अपने अतीत की एक भूल के कारण परिवार और पुत्र के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। जुगल हंसराज के साथ उनके भावनात्मक दृश्य आज भी दर्शकों को भावुक कर देते हैं।
राजेश खन्ना अभिनीत ‘अवतार’ भी पिता-पुत्र संबंधों पर आधारित यादगार फिल्मों में शामिल है। फिल्म में अवतार किशन अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी खपा देता है, लेकिन वृद्धावस्था में वही बच्चे उसे अकेला छोड़ देते हैं। यह फिल्म माता-पिता और संतानों के रिश्तों पर गहरी टिप्पणी करती है।वर्ष 2001 में प्रदर्शित ‘एक रिश्ता : द बॉन्ड ऑफ लव’ में अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार ने पिता-पुत्र की भूमिका निभाई थी। व्यवसाय, स्वाभिमान और पारिवारिक मूल्यों के बीच पैदा हुआ टकराव फिल्म का प्रमुख आकर्षण था। इसी तरह ‘कभी खुशी कभी ग़म’ में अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के बीच का भावनात्मक रिश्ता दर्शकों को बेहद पसंद आया।
वर्ष 2003 में प्रदर्शित ‘बागवान’ भले ही वृद्ध माता-पिता की कहानी थी, लेकिन इसमें पिता और पुत्रों के रिश्तों की बदलती संवेदनाओं को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया। अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया गया राज मल्होत्रा का किरदार आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार पिता पात्रों में गिना जाता है।पिता-पुत्र के रिश्ते को भावनात्मक और प्रेरणादायक अंदाज में प्रस्तुत करने वाली फिल्मों में वर्ष 2007 में प्रदर्शित अनिल शर्मा निर्देशित ‘अपने’ का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। इस फिल्म में धर्मेन्द्र ने एक पूर्व मुक्केबाज बलदेव चौधरी की भूमिका निभाई थी, जो परिस्थितियों के कारण अपने खेल जीवन में वह मुकाम हासिल नहीं कर पाता जिसका उसने सपना देखा था। अपने अधूरे सपनों और टूटे आत्मसम्मान को वह अपने बेटों के माध्यम से पूरा करने की कोशिश करता है।
फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें वास्तविक जीवन की पिता-पुत्र की जोड़ी धर्मेन्द्र, सनी देओल और बॉबी देओल ने पहली बार एक साथ मुख्य भूमिकाएं निभाईं। पर्दे पर उनकी सहज केमिस्ट्री ने कहानी को और अधिक विश्वसनीय बना दिया। फिल्म में बलदेव चौधरी अपने बेटों को केवल सफलता का रास्ता ही नहीं दिखाता, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और पारिवारिक एकता का महत्व भी सिखाता है।‘अपने’ में पिता और पुत्रों के रिश्ते को केवल भावनात्मक नजरिए से ही नहीं, बल्कि सपनों, असफलताओं और आत्मसम्मान की लड़ाई के रूप में भी दिखाया गया है। विशेष रूप से वे दृश्य, जिनमें धर्मेन्द्र अपने बेटों को हार न मानने और अपने लक्ष्य के लिए लड़ते रहने की प्रेरणा देते हैं, दर्शकों को भावुक कर देते हैं। फिल्म का संदेश यह था कि एक पिता अपने बच्चों की सफलता में अपनी सबसे बड़ी जीत देखता है।
धर्मेन्द्र के सशक्त अभिनय और सनी देओल तथा बॉबी देओल के साथ उनके भावनात्मक दृश्यों ने ‘अपने’ को हिंदी सिनेमा की यादगार पिता-पुत्र फिल्मों में शामिल कर दिया। यह फिल्म आज भी इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि परिवार की एकजुटता और पिता का विश्वास किसी भी कठिनाई को पार करने की ताकत दे सकता है।आमिर खान की ‘अकेले हम अकेले तुम’ में एक पिता का अपने बेटे के लिए संघर्ष दिखाया गया।राजकुमार हिरानी निर्देशित ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में सुनील दत्त और संजय दत्त की वास्तविक जीवन की पिता-पुत्र जोड़ी ने पर्दे पर भी भावनात्मक जादू बिखेरा। एक पिता की अपने बेटे से अपेक्षाएं और बेटे का पिता का सम्मान पाने का संघर्ष फिल्म की भावनात्मक ताकत था।
वर्ष 2009 में प्रदर्शित ‘पा’ ने पिता-पुत्र के रिश्ते को बिल्कुल नए अंदाज में प्रस्तुत किया। फिल्म में वास्तविक जीवन के पिता-पुत्र अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन ने पर्दे पर उलटी भूमिकाएं निभाईं। अभिषेक पिता बने और अमिताभ उनके पुत्र। यह प्रयोग दर्शकों को बेहद पसंद आया।इसी तरह ‘जर्सी’ में शाहिद कपूर ने एक ऐसे पिता की भूमिका निभाई जो अपने बेटे की खुशी के लिए जीवन की कठिन चुनौतियों का सामना करता है।
इन फिल्मों ने साबित किया कि पिता केवल परिवार का मुखिया नहीं, बल्कि बच्चों का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक भी होता है।बदलते दौर के साथ हिंदी सिनेमा में पिता की छवि भी बदलती रही है। एक समय जहां पिता को केवल अनुशासन और अधिकार के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता था, वहीं बाद के वर्षों में वह भावनाओं को समझने वाले दोस्त, मार्गदर्शक और संघर्ष के साथी के रूप में भी नजर आए। ‘आवारा’ के वैचारिक टकराव से लेकर ‘मुगल-ए-आज़म’ के राजधर्म और पुत्र प्रेम के संघर्ष, ‘शक्ति’ के कर्तव्य और ममता के द्वंद्व, ‘बागवान’ की उपेक्षा, ‘अपने’ के सपनों और ‘पा’ के अनूठे रिश्ते तक, हिंदी सिनेमा ने पिता-पुत्र संबंधों के लगभग हर रंग को पर्दे पर उकेरा है। यही वजह है कि इन फिल्मों के पिता पात्र केवल किरदार बनकर नहीं रह गए, बल्कि दर्शकों की स्मृतियों का स्थायी हिस्सा बन गए। फादर्स डे के अवसर पर ये फिल्में हमें याद दिलाती हैं कि पिता केवल परिवार का मुखिया नहीं, बल्कि वह मजबूत आधार होता है, जिस पर संतानों के सपने, संस्कार और भविष्य खड़े होते हैं।
उल्लेखनीय है कि हर वर्ष जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाया जाता है। यह अवसर पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का होता है। हिंदी सिनेमा में पिता-पुत्र के रिश्तों पर बनी फिल्मों ने न केवल दर्शकों का मनोरंजन किया है, बल्कि रिश्तों की गहराई, जिम्मेदारियों और भावनात्मक मूल्यों को भी प्रभावशाली ढंग से सामने रखा है।