
जालौन 26 जून । अंग्रेजी हुकूमत के समय ‘पश्चिम भारत का प्रवेश द्वार’ के तौर पर विख्यात सांस्कृतिक और ऐतिहासिक नगर कालपी सरकारी अफसरों की उदासीनता के चलते अपनी अनूठी पहचान खोता नजर आ रहा है।उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में यमुना नदी के पावन तट पर बसा कालपी सदियों से भारतीय सभ्यता, संस्कृति और शौर्य का साक्षी रहा है। इस नगर ने पुराण काल से लेकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक अनेक ऐतिहासिक घटनाओं को अपने भीतर संजो रखा है। वरिष्ठ साहित्यकार हरिमोहन परिवार के अनुसार कालपी केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है।
महर्षि व्यास की तपोस्थली से लेकर चंदेल शासकों के प्रमुख केंद्र के तौर पर विख्यात इस नगर में सूर्य मंदिर, बादशाह अकबर के प्रिय दरबारी बीरबल का किला,झांसी की रानी लक्ष्मीबाई द्वारा प्रयोग में लायी गयी ग्वालियर तक की गुफा के तौर पर जाना जाता है मगर विडंबना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के उदासीन रवैये से तमाम पौराणिक और ऐतिहासिक अवशेष अब खंडहर के रुप में तब्दील होते जा रहे हैं।वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर हरिमोहन पुरवार बताते हैं कि मान्यता है कि प्राचीन काल में कालपी का नाम कालप्रिया था। चौथी शताब्दी में राजा वासुदेव द्वारा इसकी स्थापना किए जाने का उल्लेख मिलता है। पुरातात्विक साक्ष्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में हजारों वर्ष पूर्व से मानव सभ्यता विकसित थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने यहीं तपस्या की और महाभारत की रचना से भी इस भूमि का संबंध जोड़ा जाता है, जिससे कालपी का आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
मध्यकाल में 10वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान कालपी चंदेल शासकों के अधीन एक समृद्ध व्यापारिक नगर के रूप में विकसित हुआ। वर्ष 1196 ईस्वी में मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस पर अधिकार कर लिया, जिसके बाद यह दिल्ली सल्तनत और आगे चलकर मुगल साम्राज्य का महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र बना।मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में कालपी का महत्व और बढ़ गया। यहां तांबे के सिक्कों की टकसाल संचालित होती थी, जो उस समय नगर की आर्थिक समृद्धि का प्रमाण थी। साहित्यकार हरिमोहन पुरवार बताते हैं कि अकबर के नवरत्नों में शामिल बीरबल का संबंध भी कालपी क्षेत्र से माना जाता है, जो नगर की ऐतिहासिक पहचान को और मजबूत करता है।
18वीं शताब्दी में कालपी मराठाओं के अधिकार में आया, लेकिन वर्ष 1803 में अंग्रेजों ने इस पर कब्जा कर लिया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कालपी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और अन्य क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना के विरुद्ध यहां वीरतापूर्वक संघर्ष किया। वर्ष 1858 का कालपी युद्ध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।कालपी अपने ऐतिहासिक स्थलों के कारण भी देशभर में प्रसिद्ध है। यमुना तट के प्राचीन घाट, वेदव्यास मंदिर, लंका मीनार और चौरासी गुम्बद आज भी नगर की समृद्ध विरासत की कहानी कहते हैं। लंका मीनार अपनी अनूठी स्थापत्य शैली के कारण कालपी की विशेष पहचान बन चुकी है, जबकि चौरासी गुम्बद मध्यकालीन वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इतिहास के साथ-साथ कालपी हस्तनिर्मित कागज उद्योग के लिए भी लंबे समय तक प्रसिद्ध रहा। यमुना नदी के किनारे स्थित होने के कारण यह नगर व्यापार और सुरक्षा की दृष्टि से सदैव महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा। यही कारण है कि विभिन्न शासकों ने इसे अपने शासन का प्रमुख केंद्र बनाया।डॉक्टर पुरवार का कहना है कि कालपी का गौरवशाली इतिहास नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। यदि यहां की ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण और पर्यटन की दृष्टि से समुचित विकास किया जाए तो कालपी न केवल बुंदेलखंड बल्कि पूरे देश के प्रमुख ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन स्थलों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर सकता है। आज भी कालपी अपनी ऐतिहासिक विरासत, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक समृद्धि और स्वतंत्रता संग्राम की गौरवगाथा के कारण बुंदेलखंड की शान और भारत के स्वर्णिम अतीत का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।