पश्चिम एशिया की अनिश्चितता के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार बरकरार

पश्चिम एशिया की अनिश्चितता के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार बरकरार

नयी दिल्ली, 12 जुलाई (वार्ता) पश्चिम एशिया में हालिया तनाव ने वैश्विक व्यापार, समुद्री परिवहन और कीमतों के संतुलन को झकझोर दिया है, लेकिन इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपेक्षाकृत अधिक मजबूत स्थिति में बनी हुई है। ताजा व्यापक आर्थिक आंकड़े संकेत देते हैं कि इस झटके का असर धीरे-धीरे कम हो रहा है, बाहरी परिस्थितियां पहले की तुलना में कम प्रतिकूल होती जा रही हैं और भारत की घरेलू आर्थिक गतिविधियां अब भी मजबूती से आगे बढ़ रही हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच हालांकि पिछले दो दिनों से बढ़े सैन्य टकराव के कारण युद्धविराम पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। इसी पृष्ठभूमि में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने जुलाई में जारी अपने विश्व आर्थिक परिदृश्य (वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक) में वर्ष 2026 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है।यद्यपि कूटनीतिक प्रयास फिर से शुरू करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन यदि संघर्षविराम पूरी तरह विफल होता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था एक बार फिर उसी अनिश्चितता में लौट सकती है, जहां से वह हाल में बाहर निकलती दिखाई दी थी। दूसरी ओर यदि संघर्षविराम कायम रहता है तो इसका भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।पश्चिम एशिया के संघर्ष का तत्काल प्रभाव केवल भू-राजनीतिक नहीं था। इसका असर ऊर्जा आपूर्ति, माल ढुलाई, बीमा प्रीमियम और वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर भी पड़ा है। हालिया सैन्य झड़पों से पहले की रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि संघर्षविराम लागू होने के बाद समुद्री परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव कम होना शुरू हो गया था। कुछ आकलनों के अनुसार यदि संघर्षविराम कायम रहता है तो भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र पर पड़ने वाला लाभप्रदता का असर शुरुआती आशंकाओं की तुलना में लगभग आधा रह सकता है।यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में थोड़ी-सी वृद्धि भी महंगाई, चालू खाते के घाटे और औद्योगिक लागत पर व्यापक असर डाल सकती है।सकारात्मक पक्ष यह है कि यह संकट संरचनात्मक नहीं बल्कि अस्थायी प्रतीत होता है और इससे निपटना संभव है। जून 2026 के अंत तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर लगभग 666.93 अरब डॉलर रह गया, जबकि जनवरी के अंत में यह 723.8 अरब डॉलर था। इसके बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का मानना है कि यदि कोई नया बड़ा बाहरी झटका नहीं आता तो मौजूदा भंडार एक वर्ष से अधिक के आयात के लिए पर्याप्त रहेगा।विदेशी मुद्रा भंडार की यह मजबूत स्थिति नीति-निर्माताओं को आर्थिक अस्थिरता से निपटने का पर्याप्त अवसर देती है, जिससे विकास की रफ्तार प्रभावित होने की आशंका कम रहती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के ताजा संशोधित अनुमान ने उम्मीदों को कुछ हद तक कम किया है। आईएमएफ ने वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। यह पहले के अनुमानों से कम जरूर है, लेकिन वैश्विक मानकों के लिहाज से अब भी काफी मजबूत है। विश्व बैंक भी पहले कह चुका है कि ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान के बावजूद भारत वित्त वर्ष 2026-27 में 6.6 प्रतिशत की अनुमानित वृद्धि दर के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा।सरल शब्दों में कहें तो मध्यम अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था के विस्तार की कहानी बरकरार है, भले ही इसकी रफ्तार पहले की तुलना में कुछ धीमी और अनिश्चित दिखाई दे रही हो। घरेलू आर्थिक गतिविधियां अब भी विकास की सबसे बड़ी आधारशिला बनी हुई हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) के अनंतिम आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही, जबकि चौथी तिमाही में यह 7.8 प्रतिशत आंकी गयीं।इस बीच, जून में भारत का समग्र परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) घटकर 57.4 पर आ गया, लेकिन यह अब भी 50 के स्तर से काफी ऊपर बना हुआ है, जो इस बात का संकेत है कि निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में विस्तार की पर्याप्त गुंजाइश बनी हुई है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि सेवा और विनिर्माण क्षेत्र की निरंतर मजबूती बाहरी झटकों के प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकती है।वर्तमान आर्थिक चक्र में मुद्रास्फीति एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरी है। नीति-निर्माताओं को भविष्य में संभावित उतार-चढ़ाव पर सतर्क निगाह रखनी होगी। मई में खुदरा मुद्रास्फीति अप्रैल के 3.48 प्रतिशत से बढ़कर 3.93 प्रतिशत हो गई, जबकि ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान और उत्पादन लागत बढ़ने के कारण थोक मुद्रास्फीति बढ़कर 9.68 प्रतिशत पर पहुंच गयी।अलग-अलग देखें तो ये आंकड़े चिंता पैदा करने वाले नहीं हैं, लेकिन वे यह जरूर संकेत देते हैं कि बाहरी आपूर्ति संबंधी झटके कीमतों के माध्यम से तेजी से अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकते हैं।सकारात्मक पक्ष यह है कि पिछले संकटों की तुलना में इस बार मुद्रास्फीति अपेक्षाकृत नियंत्रित बनी हुई है। अनुमान है कि वस्तुओं की कीमतों में नरमी आने के साथ आने वाले महीनों में मूल्य दबाव भी सीमित रह सकता है।इससे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और व्यापक आर्थिक नीति ढांचे को जल्दबाजी में कड़े कदम उठाने के बजाय धैर्यपूर्वक परिस्थितियों का सामना करने की गुंजाइश मिलती है। आम परिवारों के लिए भी यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि कीमतों में स्थिरता वास्तविक आय, उपभोग और उपभोक्ता विश्वास को मजबूती देती है।यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति सामान्य होती है तो इससे भारतीय व्यापार को कई तरह से लाभ होगा। समुद्री परिवहन संबंधी अनिश्चितता कम होगी, बीमा प्रीमियम और मालभाड़े में कमी आएगी तथा ऊर्जा, रसायन, उर्वरक और मध्यवर्ती उत्पादों का आयात करने वाली कंपनियों के लिए आपूर्ति प्रबंधन अधिक अनुमानित और सुगम हो सकेगा।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि जनवरी-मार्च तिमाही में भारत का चालू खाता अप्रत्याशित रूप से अधिशेष में पहुंच गया। सेवा क्षेत्र से मजबूत आय और प्रवासी भारतीयों से प्राप्त प्रेषण (रेमिटेंस) इसके प्रमुख कारण रहे, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की बाहरी मजबूती को दर्शाते हैं। हालांकि यह रुझान आगामी तिमाहियों में जारी रहने की संभावना कम है और भारतीय अर्थव्यवस्था को इसके लिए तैयार रहना होगा।

यह ऐसे समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जब औद्योगिक उत्पादन भी मजबूती बनाए हुए है। अप्रैल में औद्योगिक उत्पादन 4.9 प्रतिशत बढ़ा, जबकि इससे पहले ऊर्जा लागत में वृद्धि और आपूर्ति संबंधी व्यवधान देखे गए थे। निर्यातकों और विनिर्माताओं के लिए पश्चिम एशिया में सामान्य स्थिति लौटने से भंडार प्रबंधन बेहतर होगा और आपूर्ति का समय घटेगा, जो वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए महत्वपूर्ण है।

इस समय आवश्यकता इस बात की है कि मांग को स्थिर रखा जाए, लागत संबंधी दबाव कम किए जाएं और नीतिगत स्थिरता बनाए रखी जाए, ताकि कारोबारी बेहतर परिस्थितियों को अधिक निवेश और रोजगार में बदल सकें।

पश्चिम एशिया में यदि स्थायी सुधार होता है तो भारत को आयातित महंगाई में कमी, माल ढुलाई में सुगमता और रुपये पर कम दबाव जैसे लाभ मिलेंगे। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, सुदृढ़ घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र से होने वाली अच्छी आय के साथ मिलकर यह अगले चरण की आर्थिक वृद्धि के लिए अनुकूल आधार तैयार करेगा। ऐसे में सबसे संभावित परिदृश्य अचानक तेज वृद्धि का नहीं, बल्कि बाहरी चुनौतियां कम होने के साथ धीरे-धीरे विकास दर में पुनः तेजी आने का है।

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