
कर्नल गुरु सदाय बतब्याल (सेवानिवृत्त)
नयी दिल्ली, 14 जुलाई । कुछ दिन पहले तक, ईरान से जुड़े किसी और टकराव की संभावना को मुख्य रूप से एक भू-राजनीतिक जोखिम के रूप में देखा जा रहा था लेकिन आज यह तेज़ी से एक वैश्विक आर्थिक संकट का रूप ले रहा है।
यह टकराव अब सीमित सैन्य झड़पों से आगे बढ़कर कहीं ज़्यादा खतरनाक दौर में पहुंच चुका है। इस दौर में ईरान, अमेरिका और कई खाड़ी देशों के बीच हमले एवं जवाबी हमले हो रहे हैं, वाणिज्यिक नौवहन के लिए खतरे बढ़ रहे हैं और होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता भी बढ़ती जा रही है।जो लड़ाई एक समय क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौती के रूप में शुरू हुई थी, वह अब वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं वित्तीय स्थिरता के लिए एक बड़े खतरे के रूप में उभर रही है। इसके प्रभाव दुनिया भर के शेयर बाज़ारों एवं अर्थव्यवस्थाओं में पहले से ही महसूस किए जा रहे हैं।
तनाव में यह वृद्धि पहले ही वैश्विक व्यापार को प्रभावित करना शुरू कर चुकी है। कुछ ही दिन पहले, साइप्रस के ध्वज वाला एक वाणिज्यिक जहाज, जीएफएस ग्लैक्सी होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरने के दौरान हमले का शिकार हुआ, जिससे उसे गंभीर क्षति पहुंची। जहाज़ पर सवार 11 भारतीय नागरिकों में से 10 को बचा लिया गया जबकि एक भारतीय चालक दल का सदस्य अब भी लापता है।भारत ने आधिकारिक रूप से इस हमले की निंदा की और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में सुरक्षित नौवहन की बहाली का आह्वान किया। इस घटना ने उस वास्तविकता को रेखांकित किया जिसे लेकर अर्थशास्त्री एवं रणनीतिकार लंबे समय से लेकर आशंकित रहे हैं कि जब खाड़ी में वाणिज्यिक नौवहन पर हमला होता है तो उसके परिणाम युद्धक्षेत्र से कहीं दूर तक महसूस किए जाते हैं।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य इस संकट के केंद्र में बना हुआ है। अपने सबसे संकरे बिंदु पर यह मुश्किल से 33 किलोमीटर चौड़ा है फिर भी यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्ति में से एक के रूप में कार्य करता है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार, 2024 में प्रतिदिन लगभग दो करोड़ बैरल तेल इस जलडमरूमध्य से होकर गुज़रा, जो वैश्विक पेट्रोलियम खपत का लगभग 20 प्रतिशत था। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-चौथाई और वैश्विक एलएनजी निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा इस संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। पृथ्वी पर बहुत कम स्थान ऐसे हैं जिनका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इतना प्रभाव है।एशियाई बाज़ारों पर और भी ज्यादा बुरा असर पड़ा है। बढ़ती महंगाई और सख़्त मौद्रिक स्थिति की आशंकाओं के बीच निवेशकों ने तकनीकी शेयरों से तेज़ी से पैसा निकालना शुरू कर दिया तो दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स एक ही सत्र में लगभग छह प्रतिशत गिर गया। बाज़ारों में जोखिम लेने से बचने का माहौल बनने के कारण एशियाई इंडेक्स भी नीचे आ गए।
भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है। आठ जुलाई को, ईरान के साथ कूटनीतिक सफलता की उम्मीदें खत्म होने और तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बाद, सेंसेक्स 1,677 अंक या 2.15 प्रतिशत गिर गया, जबकि निफ्टी में 2.12 प्रतिशत की गिरावट आई; यह हाल के महीनों में एक दिन में आई सबसे बड़ी गिरावटों में से एक थी।सिर्फ़ एक सत्र में निवेशकों की आठ लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की संपत्ति डूब गई। भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने पर निवेशकों की प्रतिक्रिया के कारण बाजार के डर को मापने वाला इंडेक्स, इंडिया वोलैटिलिटी इंडेक्स में लगभग 26 प्रतिशत उछाल आया। हालांकि, बाद में बाजार ने कुछ नुकसान की भरपाई कर ली लेकिन निवेशकों का भरोसा अभी भी कमज़ोर बना हुआ है।
पिछले पांच व्यापार दिनों में, भारतीय शेयर बाज़ार में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है जिसका मुख्य कारण खाड़ी क्षेत्र में हो रही घटनाएं, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और महंगाई का डर है। 13 जुलाई को भी जैसे-जैसे वैश्विक तनाव बढ़ा, इंट्राडे में एक प्रतिशत के करीब गिरावट देखी गई।भारत की कमज़ोर स्थिति इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि वह ऊर्जा के लिए आयात पर निर्भर है। भारत की कच्चे तेल की ज़रूरत का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा होता है और इसका एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। तेल की कीमतें बढ़ने से आयात का बिल बढ़ जाता है, चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ता है, रुपया कमज़ोर होता है और महंगाई बढ़ती है। कच्चे तेल की कीमतों में हर बढ़ोतरी का सीधा असर परिवहन, हवाई क्षेत्र, रसद, विनिर्माण और खेती पर पड़ता है। इसलिए, इसका आर्थिक असर सिर्फ़ पेट्रोल पंप तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि उससे कहीं ज़्यादा होता है।
यह खतरा सिर्फ़ ऊर्जा तक ही सीमित नहीं है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा और एलएनजी नौवहन का करीब 22 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज से होकर गुजरता है। अगर इसमें लंबे समय तक कोई रुकावट आती है तो माल ढुलाई की दरें, बीमा प्रीमियम और नौवहन की लागत बढ़ जाएगी। आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटों से जूझ रहे व्यवसायों को ज़्यादा स्टॉक रखना होगा और सरद का ज़्यादा खर्च उठाना पड़ेगा। एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों को देरी एवं बढ़ी हुई लागत का सामना करना पड़ सकता है जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर हो सकती है।संघर्ष जितने ज्यादा समय तक जारी रहता है आर्थिक विश्वास को होने वाली क्षति उतनी ही अधिक होती है। व्यवसाय तब निवेश करते हैं जब भविष्य का अनुमान लगाया जा सके। सरकारें स्थिर आर्थिक वृद्धि की धारणाओं के आधार पर राजकोषीय व्यय की योजना बनाती हैं। उपभोक्ता तब खर्च करते हैं जब उन्हें रोजगार एवं मुद्रास्फीति में सुरक्षा का एहसास होता है। युद्ध इन तीनों में अनिश्चितता उत्पन्न कर देता है। निवेश संबंधी निर्णय टाल दिए जाते हैं, उधार लेने की लागत बढ़ जाती है और आपूर्ति शृंखलाएं कम दक्ष हो जाती हैं।
ऑक्सफ़ोर्ड इकोनॉमिक्स का अनुमान है कि ईरान से तेल के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगने से दुनिया भर में तेल की आपूर्ति में लगभग चार प्रतिशत की कमी आ सकती है और कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य में कोई बड़ी रुकावट आती है तो कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। ऐसा झटका हाल के दशकों के सबसे बड़े ऊर्जा संकटों में से एक होगा जिससे विकसित एवं उभरती हुई दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई बढ़ेगी।विडंबना यह है कि इस टकराव से बहुत दूर बसे देशों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। जर्मनी में ज़्यादा उर्जा मुल्यों का सामना कर रहे संयंत्र, साउथ कोरिया में उत्पादन कम कर रही तकनीकी कंपनी, सिंगापुर में तेल के लिए ज़्यादा पैसे दे रही एयरलाइन, या भारत में परिवहन एवं खाने-पीने की चीज़ों के लिए ज़्यादा पैसे खर्च कर रहा परिवार ये सभी सैकड़ों या हज़ारों किलोमीटर दूर हो रहे टकराव में न चाहते हुए भी शामिल हो जाएंगे।
ईरान में फिर से शुरू होने वाला युद्ध इसलिए केवल एक क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती नहीं है बल्कि यह उस वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक प्रत्यक्ष ख़तरा है, जो पहले से ही कर्ज़, महंगाई, भू-राजनीतिक विखंडन और धीमी आर्थिक वृद्धि के बोझ तले दबी हुई है। इसकी वास्तविक कीमत केवल दागी गई मिसाइलों या विवादित क्षेत्रों से नहीं आंकी जाएगी बल्कि इसे बढ़ती महंगाई, बाधित व्यापार, शेयर बाज़ारों में अस्थिरता, क्षतिग्रस्त आपूर्ति शृंखलाओं, कमज़ोर निवेश एवं धीमी आर्थिक वृद्धि के रूप में मापा जाएगा। अर्थशास्त्र में, अनिश्चितता अब भी सबसे महंगी वस्तु बनी हुई है।(लेखक एक रणनीतिक विश्लेषक हैं। यह विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)