
वाराणसी, 5 अगस्त। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने काशी और मध्य गंगा घाटी के प्राचीन निवासियों की आनुवंशिक पहचान तथा जीवन-शैली से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं का पता लगाने के उद्देश्य से राजघाट उत्खनन में प्राप्त मानव कंकाल के वैज्ञानिक अध्ययन की शुरुआत की है। इस अध्ययन के तहत सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल राखीगढ़ी से प्राप्त मानव अवशेषों के साथ इसकी आनुवंशिक समानताओं और भिन्नताओं की भी जांच की जाएगी।यह विस्तृत आनुवंशिक एवं जैव-पुरातात्त्विक अध्ययन बीएचयू के कला संकाय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग में संरक्षित एक खंडित मानव कंकाल पर किया जा रहा है। यह कंकाल भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (एएसआई) और बीएचयू द्वारा मध्य गंगा घाटी के प्रमुख पुरातात्त्विक स्थल राजघाट में किए गए उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ था।
गंगा और वरुणा नदियों के संगम के निकट वाराणसी के उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित राजघाट की पहचान वर्ष 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार कार्य के दौरान हुई थी। इसके बाद एएसआई और बीएचयू ने यहां व्यापक उत्खनन कराया। विशेष रूप से वर्ष 1957 से 1969 के बीच प्रो. ए. के. नारायण और टी. एन. राय के नेतृत्व में हुए उत्खननों में विभिन्न सांस्कृतिक कालखंडों से जुड़े आवासीय ढांचे, टेराकोटा कलाकृतियां, मुहरें तथा अन्य महत्वपूर्ण पुरावशेष प्राप्त हुए थे।मंगलवार को प्राचीन डीएनए विशेषज्ञ डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह ने अत्यंत सावधानी के साथ कंकाल के नमूने एकत्र किए। इस दौरान प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग की प्रो. सुजाता गौतम, डॉ. सचिन तिवारी और डॉ. जोस टॉम राफेल भी उपस्थित रहे।
अध्ययन के लिए चयनित मानव कंकाल भी इन्हीं उत्खननों के दौरान मिला था। इस पर वर्तमान में विज्ञान संस्थान के जन्तु विज्ञान विभाग तथा कला संकाय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग द्वारा संयुक्त रूप से अनुसंधान किया जा रहा है।अब तक इस कंकाल का कोई वैज्ञानिक जैविक विश्लेषण नहीं किया गया था और न ही इसकी सटीक कालावधि निर्धारित की जा सकी थी।
विभागाध्यक्ष प्रो. एम. पी. अहिरवार ने कहा कि राजघाट काशी की प्राचीनता और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता का महत्वपूर्ण साक्ष्य है। उन्होंने बताया कि विभाग लंबे समय से इस कंकाल का संरक्षण करता रहा है। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों की सहायता से अब यह जानने का प्रयास किया जाएगा कि गंगा घाटी के प्राचीन निवासी कौन थे, उनकी जीवन-शैली कैसी थी और उनकी आनुवंशिक पहचान क्या थी।उन्होंने कहा कि जन्तु विज्ञान विभाग की ज्ञान प्रयोगशाला के सहयोग से किया जा रहा यह अध्ययन पुरातत्त्व और आधुनिक विज्ञान के बीच समन्वय स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने बताया कि कंकाल के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए विभाग की ओर से प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया गया था।
यह अध्ययन जन्तु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के सहयोग से किया जा रहा है। प्रो. चौबे ने कहा कि यह शोध गंगा घाटी की प्राचीन आबादी की आनुवंशिक विविधता को समझने का दुर्लभ अवसर प्रदान करेगा। प्राचीन डीएनए विश्लेषण से कंकाल की वंशावली का पता लगाया जाएगा, जबकि आइसोटोप विश्लेषण के माध्यम से उसके आहार और जीवन-शैली की जानकारी प्राप्त होगी।उन्होंने कहा कि विशेष रूप से यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि राजघाट से प्राप्त यह मानव अवशेष राखीगढ़ी (हड़प्पा काल) के कंकालों से आनुवंशिक रूप से कितना मेल खाता है अथवा कितना भिन्न है। इससे सिंधु घाटी और गंगा घाटी की प्राचीन आबादियों के बीच आनुवंशिक संबंधों पर नई वैज्ञानिक जानकारी मिलने की संभावना है।
बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने इस संयुक्त प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय अंतर्विषयक अनुसंधान के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अध्ययन महत्वाकांक्षी बहुविषयक शोध को बढ़ावा देने के साथ बीएचयू को इस क्षेत्र में अग्रणी संस्थान के रूप में स्थापित करेंगे।अध्ययन के तहत तीन प्रमुख वैज्ञानिक विश्लेषण किए जाएंगे। प्राचीन डीएनए विश्लेषण के माध्यम से व्यक्ति की आनुवंशिक वंशावली, जनसंख्या संबंध तथा राखीगढ़ी सहित अन्य प्राचीन दक्षिण एशियाई नमूनों से तुलना की जाएगी। स्टेबल आइसोटोप विश्लेषण से आहार, भोजन के स्रोत और संभावित भौगोलिक गतिशीलता की जानकारी प्राप्त होगी। वहीं जैव-पुरातात्त्विक एवं रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से कंकाल की आयु, स्वास्थ्य स्थिति और उसकी सटीक कालावधि निर्धारित की जाएगी।