‘दिल चाहता है’ ने हिंदी सिनेमा को दी नई भाषा, विज्ञापन जगत ने बदली

‘दिल चाहता है’ ने हिंदी सिनेमा को दी नई भाषा, विज्ञापन जगत ने बदली

मुंबई, 08 अगस्त। फिल्म निर्देशक और अभिनेता फरहान अख्तर का कहना है कि उनकी पहली निर्देशित फिल्म ‘दिल चाहता है’ ने हिंदी सिनेमा की भाषा बदलने के साथ-साथ फिल्में बनाने के तरीके में भी बदलाव की नींव रखी। उनके मुताबिक, उस दौर में विज्ञापन जगत से जुड़े कई पेशेवर फिल्म उद्योग में आए, जिन्होंने काम करने के तरीके को अधिक व्यवस्थित और पेशेवर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।द जगरनॉट से बातचीत में फरहान अख्तर ने कहा, “फिल्म इंडस्ट्री में नई आवाजें और नया जोश आ रहा था। विज्ञापन जगत से ट्रेनिंग लेकर आए कई एग्जीक्यूटिव्स थे। मैं भी विज्ञापन से आया था। इन लोगों ने फिल्मों की शूटिंग को ज्यादा प्रोफेशनल बनाने में मदद की। मैं खुशकिस्मत था कि उस बदलाव के समय वहां मौजूद था।”वर्ष 2001 में ‘दिल चाहता है’ से निर्देशन की शुरुआत करने वाले फरहान ने कहा कि इंडस्ट्री की बदलती सोच फिल्म के हर पहलू में दिखाई दी। इसका असर फिल्म की दृश्य भाषा से लेकर उसे बनाने के तरीके तक नजर आया।

उन्होंने कहा कि उनके लिए सबसे बड़ा बदलाव हिंदी फिल्मों के भावनात्मक और संवाद के अंदाज में आया। फरहान के अनुसार, उस दौर ने एक नई भाषा को जन्म दिया। किरदार जिस तरह एक-दूसरे से बातचीत करते और व्यवहार करते थे, उसमें सहजता थी और भावनाओं को जरूरत से ज्यादा नाटकीय नहीं बनाया गया था।फिल्म के लुक को भी कई ऐसे फैसलों ने खास बनाया, जो उस समय हिंदी सिनेमा में आम नहीं थे। बी ब्लंट ने कलाकारों को स्टाइल किया। आमिर खान की गोटी और प्रीति जिंटा के घुंघराले बालों का अंदाज फिल्म की पहचान बन गया। फिल्म में सिंक साउंड का इस्तेमाल भी किया गया, जिससे कलाकारों के संवाद शूटिंग के दौरान ही रिकॉर्ड किए गए और बाद में डबिंग की जरूरत कम हुई। इससे दृश्यों में स्वाभाविकता और बढ़ गई।

फरहान अख्तर की ‘दिल चाहता है’ आधुनिक संवाद, सहज भावनाओं, स्वाभाविक अभिनय और स्लीक दृश्य शैली के कारण अपने दौर की दूसरी फिल्मों से अलग नजर आई। फिल्म ने युवा भारतीयों के रिश्तों, दोस्ती और जीवन को ऐसे अंदाज में पेश किया, जो उस समय की नई पीढ़ी को आधुनिक और अपनी जिंदगी के बेहद करीब महसूस हुआ।

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