भारत ने संरा में पाकिस्तान को लताड़ा, ‘शिष्टाचार की कमी’ के लिए उसके दूत की आलोचना की

भारत ने संरा में पाकिस्तान को लताड़ा, ‘शिष्टाचार की कमी’ के लिए उसके दूत की आलोचना की

संयुक्त राष्ट्र/नयी दिल्ली, 03 मई । भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपनी समन्वयवाद और बहुलवादी संस्कृति, परंपराओं और शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर प्रकाश डाला जबकि  विनाशकारी और हानिकारक प्रकृति के लिए पाकिस्तान की आलोचना की तथा उस पर विश्व शांति स्थापित करने संरा के सदस्यों के सामूहिक प्रयासों के खिलाफ जाने का आरोप लगाया।  
संरा में पाकिस्तान के दूत मुनीर अकरम की भारत विरोधी टिप्पणियों पर पलटवार करते हुए संरा में भारत की स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज ने कहा, ”चूंकि हम इन चुनौतीपूर्ण समय के बीच शांति की संस्कृति विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं, इसलिए हमारा ध्यान रचनात्मक बातचीत पर कायम है। इस प्रकार हम एक निश्चित प्रतिनिधिमंडल की टिप्पणियों को दरकिनार करना चाहते हैं, जिनमें न केवल मर्यादा की कमी है, बल्कि उनकी विनाशकारी और हानिकारक प्रकृति के कारण हमारे सामूहिक प्रयासों में भी बाधा आती है।”
उन्होंने गुरुवार को पाकिस्तान के खिलाफ तिखी टिप्पणी करते हुए कहा, “हम उस प्रतिनिधिमंडल को सम्मान और कूटनीति के केंद्रीय सिद्धांतों के साथ जुड़ने के लिए दृढ़ता से प्रोत्साहित करेंगे, जिन्हें हमेशा हमारी चर्चाओं का मार्गदर्शन करना चाहिए। क्या उस देश से यह पूछना बहुत ज्यादा है, जो अपने आप में सभी पहलुओं पर सबसे संदिग्ध ट्रैक रिकॉर्ड रखता है?” गौरतलब है कि श्री आलम ने ‘शांति की संस्कृति’ पर संरा महासभा की बैठक में भारत विरोधी टिप्पणी में कश्मीर, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और अयोध्या में राम मंदिर का संदर्भ दिया था।
भारत के बहुलवाद के बारे में विस्तार से बताते हुए सुश्री कंबोज ने कहा, “उल्लेखनीय धार्मिक और भाषाई विविधता के साथ भारत की सांस्कृतिक पच्चीकारी सहिष्णुता और सह-अस्तित्व का एक प्रमाण है। दिवाली, ईद, क्रिसमस और नौरोज़ जैसे त्योहार धार्मिक सीमाओं से परे जाकर विविध समुदायों के बीच साझा खुशियों का अवसर बनते हैं। देश की असंख्य भाषाएँ, बोलियाँ और व्यंजन, नस्लों, रंगों और परिदृश्यों की समृद्ध टेपेस्ट्री हमारी समग्र संस्कृति की लचीलापन और समृद्धि में योगदान करते हैं। ”
भारत की समन्वयता का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “भारत न केवल हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म का जन्मस्थान है, बल्कि इस्लाम, यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और पारसी धर्म का गढ़ भी है। यह ऐतिहासिक रूप से सताए गए विश्वासों की शरणस्थली रहा है, जो विविधता के लंबे समय से चले आ रहे आलिंगन को दर्शाता है।”
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित अहिंसा का सिद्धांत शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का आधार बना हुआ है। उन्होंने कहा, “हम विशेष रूप से चर्चों, मठों, गुरुद्वारों, मस्जिदों, मंदिरों और सभास्थलों सहित पवित्र स्थलों पर बढ़ते हमलों से चिंतित हैं। इस तरह के कृत्यों के लिए वैश्विक समुदाय से तीव्र और एकजुट प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है। ” उन्होंने कहा,  “इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हमारी चर्चाएँ राजनीतिक ज़रूरतों का विरोध करते हुए इन मुद्दों को स्पष्ट रूप से संबोधित करें। हमें इन चुनौतियों से सीधे निपटना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे हमारी नीति, संवाद और अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव के केंद्र में हों।” उन्होंने कहा, ”आतंकवाद शांति की संस्कृति और सभी धर्मों की मूल शिक्षाओं के सीधे खिलाफ में है। शांति की संस्कृति और सभी धर्मों की मूल शिक्षाओं में करुणा, समझ और सहअस्तित्व है।”
उन्होंने कहा, “यह (आतंकवाद) कलह फैलाता है, शत्रुता पैदा करता है और सम्मान तथा सद्भाव के सार्वभौमिक मूल्यों को कमजोर करता है। सम्मान तथा सद्भाव दुनिया भर में सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को रेखांकित करते हैं। उन्होंने कहा, ”सदस्य देशों के लिए शांति की वास्तविक संस्कृति को बढ़ावा देने और दुनिया को एक एकजुट परिवार के रूप में देखने के लिए सक्रिय रूप से मिलकर काम करना आवश्यक है, जैसा कि मेरा देश दृढ़ता से मानता है।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *