
किंशासा, 24 मई। वैश्विक संस्था रेड क्रॉस सोसाइटी के तीन स्वयंसेवकों की इबोला संक्रमण के संदिग्ध मामलों में मौत हो गयी है। यह घटना कॉन्गो लोकतांत्रिक गणराज्य के इतुरी प्रांत में हुई, जिसे देश में फैले इबोला प्रकोप का केंद्र माना जा रहा है।
रेड क्रॉस ने शनिवार को जारी बयान में कहा कि स्वयंसेवक अलिकाना उदुमुसी ऑगस्टिन, सेजाबो कटानाबो और अजिको चंदिरू विवियान की मौत संभवतः उस दौरान संक्रमण की चपेट में आने से हुई, जब वे एक मिशन के तहत शवों के प्रबंधन का कार्य कर रहे थे। बयान में कहा गया है, “जिस समय यह कार्य किया गया, उस समय समुदाय को इबोला वायरस रोग के प्रकोप की जानकारी नहीं थी और न ही संक्रमण की पहचान हुई थी।”
संगठन ने कहा, “इन स्वयंसेवकों ने साहस और मानवता की भावना के साथ अपने समुदाय की सेवा करते हुए अपने प्राण गंवाए।” बताया गया है कि ये स्वयंसेवक इस महामारी के पहले पहचाने गए पीड़ितों में शामिल हैं। वर्तमान प्रकोप दुर्लभ बुंडिबुग्यो वायरस से फैल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महासचिव ट्रेडोस घेबरेयेसस ने स्वयंसेवकों की मौत पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने “कर्तव्य पालन के दौरान सर्वोच्च बलिदान दिया है।” उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा, “मामलों की शीघ्र पहचान और समय पर उपचार जीवन बचाने तथा इस प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षित और सम्मानजनक अंतिम संस्कार भी इबोला संक्रमण रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं।”
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार शुक्रवार तक कांगो में इबोला के 82 मामलों की पुष्टि हो चुकी है तथा सात लोगों की मौत की आधिकारिक पुष्टि हुई है। डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने कहा कि वास्तविक स्थिति “काफी बड़ी” हो सकती है, क्योंकि लगभग 750 संदिग्ध मामले और 177 संदिग्ध मौतों की जानकारी मिली है। कांगो के संचार एवं मीडिया मंत्रालय ने शुक्रवार तक संदिग्ध मृतकों की संख्या 204 बताई थी।यह प्रकोप पड़ोसी युगांडा तक भी फैल चुका है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार शनिवार को वहां इबोला के तीन नए मामलों की पुष्टि हुई, जिससे संक्रमितों की कुल संख्या पांच हो गई है। डब्ल्यूएचओ ने इस सप्ताह कांगो में इबोला प्रकोप से जुड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम को “उच्च” से बढ़ाकर “बहुत उच्च” कर दिया है, हालांकि वैश्विक स्तर पर जोखिम को अभी भी कम बताया गया है। इबोला एक गंभीर और घातक बीमारी है, जिसकी पहली बार पहचान 1976 में हुई थी। इसके लक्षणों में तेज बुखार, कमजोरी, दस्त और उल्टी शामिल हैं।