सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर की संवैधानिकता को बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर की संवैधानिकता को बरकरार रखा

नयी दिल्ली, 27 मई । उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखते हुए कहा कि इस प्रक्रिया को अंजाम देना चुनाव आयोग की शक्तियों के अधीन है और यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव आयोजित करने के संवैधानिक लक्ष्य के अनुरूप है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि बिहार से शुरू हुई और बाद में 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ायी गयी एसआईआर प्रक्रिया को केवल इसलिए अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि यह धारा 21(2) के साथ नियम 25 के तहत संशोधन के लिए सोची गयी सामान्य प्रक्रियाओं के हर पहलू के अनुरूप नहीं थी। पीठ ने कहा कि मतदाता सूचियों का संशोधन ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ का उल्लंघन नहीं करता है, बल्कि इसके विपरीत, “यह धारा 21(3) द्वारा प्रदान किये गये सटीक वैधानिक माध्यम के ज़रिये अनुच्छेद 324 के संवैधानिक आदेश को संबल प्रदान करता है।”इस विवादित मुद्दे पर कि क्या चुनाव आयोग मतदाता सूची में शामिल करने के लिए किसी व्यक्ति की नागरिकता की जांच कर सकता है, फ़ैसले में कहा गया, “आयोग अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन करते हुए मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता के बारे में खुद को संतुष्ट करने के उद्देश्य से नागरिकता के संबंध में सीमित जांच करने के लिए अधिकृत है। ऐसी जांच को कड़े अर्थों में नागरिकता का निर्धारण नहीं माना जा सकता। इसके आधार पर की गयी कोई भी कार्रवाई केवल चुनावी परिणामों तक ही सीमित रहती है।”उच्चतम न्यायालय ने कहा, “इस तरह के निर्धारण का परिणाम भी उसी अनुपात में सीमित होता है। यह किसी व्यक्ति के मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को प्रभावित करता है, और इस तरह चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने के उसके अधिकार पर असर डालता है। यह व्यक्ति को नागरिकता के दावों से वंचित नहीं करता है, और न ही यह नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा उस सवाल के निर्धारण के रास्ते बंद करता है।”

चुनाव आयोग द्वारा की गयी एसआईआर प्रक्रिया की संवैधानिकता को सही ठहराते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “एसआईआर प्रक्रिया न तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और 1960 के नियमों के सीधे विरोध में है, और न ही यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक अनिवार्यता को कम करती है। इसके विपरीत, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका आधार लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) और संविधान के अनुच्छेद 324 में मिलता है। इसे उसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है जिसे संविधान के भाग 15 में संरक्षित करने का प्रावधान है।”

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया “मतदाता सूचियों की सटीकता, पूर्णता और शुचिता” को बहाल करने के “वैध और संवैधानिक रूप से आधारित उद्देश्य” पर आधारित थी। न्यायालय ने अपने 124-पृष्ठ के फैसले में कहा, “अपनाये गये उपायों का, हासिल किये जाने वाले उद्देश्य के साथ एक तार्किक संबंध है। वे स्पष्ट रूप से अत्यधिक नहीं हैं। मनमाने ढंग से किसी को बाहर किये जाने से रोकने के लिए उनके साथ पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय भी मौजूद हैं।”

इस प्रक्रिया के आनुपातिक होने के संबंध में, फ़ैसले में कहा गया, “जिस समस्या को हल करने का प्रयास किया जा रहा है उसकी प्रकृति, इस प्रक्रिया के पैमाने, और इसके कार्यान्वयन के दौरान शामिल किये गये प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए, आयोग द्वारा अपनाये गये उपायों को उस उद्देश्य के अनुपातहीन नहीं कहा जा सकता जिसे प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।”फ़ैसले में नागरिकता के मुद्दे पर कहा गया कि जिन मामलों में आयोग को यह संतोष नहीं होता कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने के लिए ज़रूरी कानूनी शर्तें पूरी करता है, तो यह उसकी ज़िम्मेदारी होगी कि वह ऐसे व्यक्ति को केंद्र सरकार के भीतर मौजूद सक्षम अधिकारी के पास भेजे, ताकि कानून के मुताबिक उस पर फ़ैसला लिया जा सके। इसमें कहा गया है “आयोग का निर्णय, जो केवल चुनावी उद्देश्यों तक सीमित है, नागरिकता के प्रश्न पर अंतिम नहीं माना जा सकता। इसलिए, इस आधार पर किया गया कोई भी विलोपन, सक्षम प्राधिकारी द्वारा किए जाने वाले ऐसे निर्णय के परिणाम के अधीन रहेगा।” फ़ैसले में 2003 की मतदाता सूची से बाहर किये गये लोगों के संबंध में कहा गया, “जिन लोगों के नाम 2003 की सूची से इसलिए हटा दिये गये हैं क्योंकि आयोग की राय में वे नागरिक नहीं हैं, आयोग ऐसे मामलों को चार हफ़्तों के भीतर नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकारी को उनकी नागरिकता के निर्धारण के लिए भेजेगा।”

न्यायालय ने यह निर्देश भी दिया कि सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार निर्णय ले। यह निर्णय अगले संसदीय, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों से पहले (जो भी पहले हो) से पहले लिया जाये और ऐसा करने से पहले उन व्यक्तियों को नोटिस दे और उन्हें सुनवाई का अवसर प्रदान करे जिनके नाम सूची से हटा दिये गये हैं। इसमें यह भी कहा गया कि यदि ऐसे व्यक्तियों को नागरिक माना जाता है, तो उनके नाम मतदाता सूची में बहाल कर दिये जाएंगे। इसके अतिरिक्त, बिहार के वे सभी निवासी जिनके नाम गलती से इस आधार पर हटा दिये गये थे कि वे अनुपस्थित थे, मृत थे, कहीं और चले गये थे या उनके नाम दोहराये गये थे, वे न्यायिक समीक्षा के माध्यम से आयोग के निर्णय को चुनौती देने के हकदार होंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *