
अमरोहा, 07 जून (वार्ता) उत्तर प्रदेश की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के लिए समाजवादी पार्टी इस बार सुरक्षित सीटों के रास्ते आगे बढ़ेगी। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद सपा अब दलित बहुल क्षेत्रों में सांगठनिक ढांचे और सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से मजबूत कर रही है।इसी रणनीति के तहत पार्टी नेतृत्व ने पहली बार छात्र सभा, युवजन सभा और यूथ ब्रिगेड के माध्यम से आरक्षित सीटों का त्रिस्तरीय ग्राउंड सर्वे कराकर वास्तविक राजनीतिक डेटा जुटाया है। मुख्य फोकस उन विधानसभा क्षेत्रों पर है, जहां 2022 के चुनाव में सपा की हार का अंतर बहुत कम था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में स्थितियां बदलती हुई दिखाई दीं।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति और दो सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, जिन पर पिछले दो चुनावों से भाजपा बढ़त बनाए हुए है। वर्ष 2017 में भाजपा ने इनमें से 70 और 2022 में 65 सीटें जीती थीं, जबकि सपा सिर्फ 20 सीटों पर सिमट गई थी। अब सपा की रणनीति बसपा के कमजोर होते जनाधार और भाजपा के गैर-जाटव दलित वोट बैंक में सेंध लगाने पर केंद्रित है। पासी, कोरी, वाल्मीकि, धोबी और खटीक जैसे वर्गों को पीडीए से जोड़ने के लिए तीनों फ्रंटल संगठनों ने बूथ कमेटियों की सक्रियता, जातीय समीकरण और विरोधी दलों की स्थिति का बारीकी से आकलन किया है।विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए जिन सीटों की रिपोर्ट में अंतर था, वहां दोबारा भौतिक सत्यापन भी कराया गया है। करीब 80 सीटों पर यह कवायद पूरी हो चुकी है, जिसे 2027 के लिए टिकट वितरण और चुनावी अभियान की तैयारी माना जा रहा है। सपा का मानना है कि यदि लोकसभा चुनाव जैसी सामाजिक गोलबंदी विधानसभा स्तर पर भी दोहराई गई, तो उसका दावा सबसे मजबूत होगा। दूसरी ओर, सूबे में जीत की हैट्रिक लगाने के लिए भाजपा भी अगस्त में 10 हजार ‘ड्राइंग रूम बैठकों’ के जरिए करीब 60 हजार कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद कर गुटबाजी खत्म करने और माहौल बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं, बसपा भी अपने कैडर को मजबूत करने में जुटी है, जबकि कांग्रेस की जमीनी सक्रियता फिलहाल चुनावी समर में काफी पीछे नजर आ रही है।