
नयी दिल्ली, 12 जून । रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) से अनुसंधान और विकास के साथ-साथ रक्षा उपकरणों के बड़े पैमाने पर उत्पादन की प्रक्रिया में तेज़ी लाने का आग्रह किया है।उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में सफलता सुनिश्चित करने के लिए केवल प्रौद्योगिकी श्रेष्ठता ही काफी नहीं है बल्कि सशस्त्र बलों के पास रक्षा उपकरण भी पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए।हैदराबाद में रक्षा अनुसंधान और विकास प्रयोगशाला (डीआरडीएल) में ‘एडवांस्ड वेपन सिस्टम कॉम्प्लेक्स’ के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए श्री सिंह ने कहा कि भारत रक्षा क्षेत्र में आधुनिकीकरण के एक महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा है क्योंकि तेज़ी से हो रही प्रौद्योगिकी प्रगति युद्ध के स्वरूप को बदल रही है। देश के प्रतिष्ठित ‘मिसाइल क्लस्टर’ का दौरा करने पर गर्व व्यक्त करते हुए, रक्षा मंत्री ने कहा कि इस संस्थान ने भारत की प्रौद्योगिकी उत्कृष्टता, वैज्ञानिक क्षमता और रणनीतिक स्वायत्तता को मज़बूत करने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि यह क्लस्टर कई बड़ी उपलब्धियों में सहायक रहा है और देश की वैज्ञानिक प्रतिभा और नवाचार का प्रतीक बना हुआ है।
श्री सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का ज़िक्र करते हुए कहा कि आकाश मिसाइल सिस्टम और ब्रह्मोस जैसी स्वदेशी रक्षा प्रणालियों ने वास्तविक युद्ध जैसी स्थितियों में अपनी क्षमता साबित की है। उन्होंने कहा कि इनके प्रदर्शन ने वैश्विक रक्षा प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम में प्रतिस्पर्धा करने की भारत की क्षमता को और मज़बूत किया है।उन्होंने कहा, “दुनिया भर में युद्ध का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है। सटीक प्रहार करने की क्षमता, एकीकृत वायु रक्षा प्रणाली, हाइपरसोनिक हथियार, स्वायत्त प्लेटफॉर्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और उन्नत सेंसर तकनीकें आधुनिक युद्ध के स्वरूप को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं।”
रक्षा मंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय माहौल में अनिश्चितता, संघर्ष और बदलते भू-राजनीतिक समीकरण देखने को मिल रहे हैं। ऐसे में, डीआरडीओ की भूमिका केवल तकनीकी बदलावों के अनुरूप ढलने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे भविष्य के युद्धक्षेत्र की ज़रूरतों का भी अनुमान लगाना होगा।उन्होंने कहा, “हमें न केवल वर्तमान की चुनौतियों का सामना करना चाहिए, बल्कि भविष्य के युद्ध की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए आज काम करना चाहिए।” उन्होंने वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं से भविष्य की उन तकनीकों पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया जो भारत को रणनीतिक बढ़त दिला सकें।
उत्पादन क्षमता के महत्व पर ज़ोर देते हुए श्री सिंह ने कहा कि सशस्त्र बलों को न केवल अत्याधुनिक उपकरणों की ज़रूरत है, बल्कि ऐसे सिस्टम की पर्याप्त संख्या में समय पर उपलब्धता भी ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि युद्ध में सफलता तकनीकी नवाचार के साथ-साथ बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता पर भी निर्भर करती है।उन्होंने डीआरडीओ नेतृत्व से उत्पादन को विकास प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग मानने पर जोर देते हुए कहा कि विकास से उत्पादन तक के समय को कम करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा,” विनिर्माण प्रक्रिया को आसान बनाया जाना चाहिए, स्वदेशी सामग्री को बढ़ाया जाना चाहिए और सिस्टम को इस तरह से डिज़ाइन किया जाना चाहिए कि जब भी सशस्त्र बलों को ज़रूरत हो, तेज़ी से बड़े पैमाने पर उप्तादन किया जा सके।”
उन्होंने कहा, “सरकार ने स्वदेशी रक्षा तकनीकों के विकास के लिए डीआरडीओ पर अभूतपूर्व भरोसा जताया है। यह भरोसा सम्मान की बात है, लेकिन इसके साथ एक बड़ी ज़िम्मेदारी भी आती है।”