
लखनऊ, 23 जून। लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड के बाद अब संबंधित भवन से जुड़े पुराने अभिलेख और प्राधिकरण की कार्रवाई चर्चा का विषय बन गए हैं। जिस भवन में सोमवार को यह दर्दनाक हादसा हुआ, उसके खिलाफ वर्ष 2016 में अवैध निर्माण के आरोप में ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया था, लेकिन दो माह से भी कम समय में वह आदेश निरस्त कर दिया गया था।
प्राप्त जानकारी के अनुसार अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी का आवंटन 11 जुलाई 1980 को लॉटरी प्रणाली के तहत विजय कुमार पुत्र रामेश्वर सहाय को किराया-क्रय पद्धति पर किया गया था। चार नवंबर 1980 को अनुबंध निष्पादित होने के बाद भवन का कब्जा आवंटी को सौंप दिया गया।
बाद में वर्ष 2005 में यह भवन विक्रय विलेख के माध्यम से विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुआ। इसके बाद 19 जनवरी 2013 को दोनों ने यह संपत्ति वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला के नाम विक्रय कर दी। सात अगस्त 2014 को लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने दोनों के पक्ष में नामांतरण की प्रक्रिया पूरी की। करीब 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाले इस भवन का मानचित्र 20 अगस्त 2014 को स्वतः मानचित्र योजना के तहत आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था।
सूत्रों के अनुसार बाद में भवन में अनधिकृत निर्माण की शिकायतें सामने आईं, जिसके आधार पर लखनऊ विकास प्राधिकरण ने वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के विरुद्ध मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज कराया। मामले की सुनवाई के बाद विहित प्राधिकारी ने 10 मई 2016 को अवैध निर्माण के खिलाफ ध्वस्तीकरण का आदेश पारित कर दिया था।
हालांकि, इस कार्रवाई ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब ध्वस्तीकरण आदेश जारी होने के दो माह के भीतर ही पांच जुलाई 2016 को उक्त आदेश निरस्त कर दिया गया। अब अलीगंज अग्निकांड के बाद इस फैसले पर भी सवाल उठने लगे हैं और यह चर्चा का विषय बन गया है कि जिस भवन के खिलाफ कभी अवैध निर्माण के आधार पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई प्रस्तावित हुई थी, वह आदेश आखिर किन परिस्थितियों में वापस लिया गया।
अग्निकांड की जांच के बीच भवन से जुड़े पुराने रिकॉर्ड और प्रशासनिक निर्णयों की भी पड़ताल की जा रही है, जिससे घटना से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट हो सके।