बया चिड़िया के घोंसले दे रहे मानसून के संकेत, प्रकृति की भाषा पर आज भी भरोसा करते हैं ग्रामीण

बया चिड़िया के घोंसले दे रहे मानसून के संकेत, प्रकृति की भाषा पर आज भी भरोसा करते हैं ग्रामीण

जालौन, 23 जून। आधुनिक मौसम विज्ञान और उपग्रह आधारित पूर्वानुमानों के दौर में भी जालौन जिले के ग्रामीण अंचलों में प्रकृति के संकेतों को मौसम का विश्वसनीय पैमाना माना जाता है। यहां के किसान और बुजुर्ग आज भी पक्षियों की गतिविधियों को देखकर वर्षा और मौसम का अनुमान लगाते हैं।काशीखेड़ा गांव के बुजुर्ग कल्लू यादव और अमर सिंह चंदेल बताते हैं कि मानसून के आगमन से पहले कई पक्षियों के व्यवहार में बदलाव दिखाई देने लगता है। बया, बुलबुल, गौरैया और अन्य छोटी चिड़ियां तेजी से घोंसलों का निर्माण शुरू कर देती हैं, जिसे अच्छी वर्षा का संकेत माना जाता है।

ग्रामीणों के अनुसार जब बया चिड़िया बड़ी संख्या में घोंसले बनाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि बारिश का मौसम निकट है। इस वर्ष भी खेतों और जलाशयों के आसपास स्थित कांटेदार पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर बड़ी संख्या में बया के घोंसले दिखाई दे रहे हैं। बया चिड़िया अपने घोंसलों के लिए ऐसे स्थानों का चयन करती है जहां नीचे पानी भरा हो और सांप अथवा अन्य शिकारी आसानी से न पहुंच सकें। यह पक्षी अपने अंडों और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए घोंसले बनाता है।विशेषज्ञों के अनुसार बया चिड़िया का प्रजनन काल मानसून से जुड़ा होता है। इस दौरान नर बया का रंग पीला हो जाता है, जबकि सामान्य दिनों में उसका रंग भूरा रहता है। घोंसले का निर्माण नर बया ही करता है। लगभग 28 दिनों की मेहनत से वह घास के रेशों को चोंच की सहायता से बुनकर एक अनूठी संरचना तैयार करता है। आधा घोंसला बनने के बाद वह मादा को आकर्षित करता है और मादा की स्वीकृति मिलने पर दोनों मिलकर उसे पूरा करते हैं।

प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) प्रदीप कुमार ने बताया कि बया सहित कई पक्षी अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों के माध्यम से मौसम में होने वाले बदलावों का आभास पहले ही कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि बया का घोंसला प्रकृति की अद्भुत इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी बुनावट इतनी मजबूत और संतुलित होती है कि तेज हवा और बारिश भी इसे आसानी से नुकसान नहीं पहुंचा पाती।उन्होंने बताया कि बया प्रायः पेड़ों की पूर्व दिशा वाली शाखाओं पर घोंसले बनाती है, जिससे वे मानसूनी हवाओं और तेज वर्षा के प्रभाव से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं। बया पक्षी को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-4 में संरक्षित किया गया है तथा इसके शिकार, व्यापार या कैद में रखने पर प्रतिबंध है।

वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस वर्ष बड़ी संख्या में दिखाई दे रहे बया के घोंसले अच्छी और संभवतः सामान्य से अधिक वर्षा का संकेत हो सकते हैं। ग्रामीणों के लिए बया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि प्रकृति का ऐसा संदेशवाहक है जो आने वाले मौसम की सूचना पहले ही दे देता है। यही कारण है कि आज भी गांवों में किसान इसकी गतिविधियों को देखकर वर्षा और फसल की संभावनाओं का आकलन करते हैं।

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