
नयी दिल्ली, 31 जुलाई । सरकार ने शुक्रवार को दावा किया कि देश में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम खाद्य सुरक्षा, किसान कल्याण और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने वाला कार्यक्रम है और एथेनॉल मिश्रण न होता हाल में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों के उछाल के दौरान में पेट्रोल का भाव 125 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच जाता।पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, ” एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाने, आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए किसानों का समर्थन करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पहल है।”
इस कार्यक्रम के बारे में हाल ही में किए गए उन कुछ दावों को इस कार्यक्रम की आधी-अधूरी और भ्रामक तस्वीर पेश करने वाला बताया है जिसमें कहा गया है कि ई20 ( 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण) केवल करदाताओं के पैसे पर आधारित सब्सिडी से चाल रहा है।एथेनॉल के सस्ता या महंगा होने के प्रश्न पर मंत्रालय ने कहा है कि अगर वैश्विक तेल की कीमतों में उछाल के दौरान एथेनॉल की मिलावट नहीं होती और जब भारत में आयात किये जाने वाले कच्चे तेल का भाव 135 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल हो तो दिल्ली में बिना एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल की कीमत लगभग 125 रुपये प्रति लीटर होती ।
मंत्रालय ने कहा है,” … इसके बजाय, उपभोक्ताओं ने 94.77 रुपए प्रति लीटर का भुगतान किया क्योंकि प्रत्येक लीटर का 20 प्रतिशत घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल था, जिसे स्थिर, पूर्व-सहमत कीमतों पर प्राप्त किया गया था जो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि से अप्रभावित थीं। इसका परिणाम क्या हुआ? संकट के चरम पर पहुंचने के दौरान पेट्रोल पंप पर प्रति लीटर लगभग 30 रुपए की बचत हुई।मंत्रालय ने कहा, ” एथेनॉल मिश्रण का असली महत्व है हर दिन सबसे सस्ता ईंधन उपलब्ध कराना नहीं है। इसका उद्देश्य भारतीय उपभोक्ताओं को वैश्विक तेल बाजारों में अत्यधिक अस्थिरता से बचाना, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और देश के ईंधन बिल का अधिक हिस्सा विदेशों में भेजने के बजाय भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर ही रखना है।”
इस कार्यक्रम ने पहले ही 1.97 लाख करोड़ रुपए से अधिक की विदेशी मुद्रा में बचत हो चुकी है। 316 लाख टन से अधिक कच्चे तेल के आयात की जरूरत खत्म हो चुकी है तथा 950 लाख टन से अधिक कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जन में कमी आयी है।मंत्रालय ने कहा है कि इस कार्यक्रम से किसानों और आसवनियों को 1.66 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है जिससे जिससे कृषि उत्पादों के लिए एक स्थिर घरेलू बाजार का निर्माण हुआ।
विज्ञप्ति में कहा गया है कि भारत को अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत तेल आयात करना पड़ता है, एथेनॉल मिश्रण का उद्देश्य आयातित कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता को कम करना है, .. यह वैश्विक तेल संकटों के खिलाफ एक बीमा पॉलिसी है, न कि दिन-प्रतिदिन की मूल्य प्रतिस्पर्धा।मंत्रालय ने इस कार्यक्रम को सरकारी सहायता से चलाया जा रहा कार्यक्रम साबित करने वाले दावों को खारिज करते हुए कहा है, ” एथेनॉल ब्लेंडिंग करदाताओं की सब्सिडी नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा है और संकट के समय इसने अपना वादा पूरा किया।”
एथेनॉल कार्यक्रम के लिए भारतीय खाद्य निगम ( एफसीआई) से 37 रुपये प्रति किलो के भाव का चावल आसवनियों को 23 रुपये के भाव देने से 10,000 करोड़ रुपये के नुकसान तथा एथेनॉल के पेट्रोल से महंगा होने की सरकार की स्वीकारोक्ति संबंधी दावे के बारे में मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वास्तव में एथेनॉल कार्यक्रम में क्षतिग्रस्त अनाज, टूटे हुए चावल और मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त खाद्यान्न शामिल होते हैं- या फिर ऐसे भंडार जो गोदामों में सड़ जाते हैं।पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा है, ” यह गरीबों से भोजन छीनना नहीं है बल्कि यह कचरे को धन में बदलने, आयात को कम करने के साथ भारतीय किसानों के हाथों में अधिक धन देना है। यह कार्यक्रम और भी आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री जीवन योजना के माध्यम से, भारत कृषि अवशेषों से दूसरी पीढ़ी के एथेनॉल का तेजी से विस्तार कर रहा है, जिससे खाद्यान्नों पर निर्भरता पूरी तरह से कम हो रही है।”
मंत्रालय ने कहा है कि भारत का एथेनॉल कार्यक्रम दुनिया के सबसे जिम्मेदार कार्यक्रमों में से एक है।मंत्रालय ने यह भी कहा कि इस कार्यक्रम में चावल को कोई विशेष वरीयता नहीं दी गई। एथेनाल वर्ष 2025-26 के लिए फीडस्टॉक के आधार पर एथेनॉल की कीमतों की जानकारी देते हुए विज्ञप्ति में कहा गया है कि मक्का के लिए 71.86 रुपए प्रति लीटर, गन्ने का रस/सीरा के लिए 65.61 रुपए, क्षतिग्रस्त अनाज के लिए 64.00 रुपए , बी-भारी गुड़ 60.73 रुपए , एफसीआई चावल 60.32 रुपए, सी-भारी सीरा फीडस्टॉक वाले एथेनॉल के लिए 57.97 रुपए प्रति लीटर का भाव दिया गया।
मंत्रालय ने कहा कि एथेनॉल वर्ष 2023-24 में, एफसीआई चावल का योगदान एथेनॉल उत्पादन में लगभग नगण्य यानि केवल 0.02 प्रतिशत था। ईएसवाई 2025-26 तक, इसकी हिस्सेदारी बढ़कर प्रतिशत हो गई क्योंकि खाद्य सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने के बाद एफसीआई का अधिशेष स्टॉक उपलब्ध हो गया था।इसी अवधि के दौरान, मक्का की हिस्सेदारी 42.6 प्रतिशत से घटकर 35.96 प्रतिशत हो गई, जिससे पता चलता है कि उत्पादक उपलब्धता के आधार पर विभिन्न फीडस्टॉक के बीच अदला-बदली करते रहते हैं।