
चेन्नई/नई दिल्ली, 14 अगस्त । बेल्जियम और नीदरलैंड में शनिवार से शुरू होने वाले एफआईएच पुरुष हॉकी विश्व कप 2026 में भारत एक शानदार इतिहास और उसे आगे बढ़ाने या नया इतिहास रचने को तैयार नई पीढ़ी के साथ उतर रहा है।विश्व कप में भारत की एकमात्र जीत के 51 साल बाद भी, 1975 की उस जीत की गूंज देश की हॉकी की दुनिया में आज भी सुनाई देती है। कुआलालंपुर में कप्तान अजीत पाल सिंह के नेतृत्व में जीता गया वह खिताब भारतीय खेलों के इतिहास का एक यादगार अध्याय है । यह उस दौर की याद दिलाता है जब हॉकी देश की खेल पहचान का अहम हिस्सा थी।
भारत के स्वतंत्रता दिवस के आसपास शुरू हो रहे इस टूर्नामेंट में, भारत कल वेल्स के खिलाफ अपना पहला मैच खेलेगा। टीम अपनी शानदार विरासत के साथ ग्लोबल मंच पर वापसी कर रही है, लेकिन उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि सिर्फ़ इतिहास के दम पर मैच नहीं जीते जा सकते।कप्तान हरमनप्रीत सिंह और उनकी टीम के लिए चुनौती पुरानी यादों को प्रेरणा में और अपनी प्रतिष्ठा को अच्छे नतीजों में बदलने की है। वर्तमान और 1975 की उस यादगार जीत के बीच एक दिलचस्प समानता है। अजीत पाल सिंह ने भारत के कप्तान के तौर पर अपने दूसरे विश्व कप में खिताब जीता था। इससे पहले उन्होंने 1971 के टूर्नामेंट में टीम की कप्तानी की थी।
हरमनप्रीत भी कप्तान के तौर पर अपने दूसरे विश्व कप में भारत की अगुवाई करेंगे। उन्होंने पहली बार 2023 के टूर्नामेंट में कप्तानी की थी। ऐसा करके, वे अजीत पाल सिंह के बाद दो विश्व कप में भारत की कप्तानी करने वाले दूसरे भारतीय खिलाड़ी बन जाएंगे। टूर्नामेंट के लिए भारत की तैयारियों से काफी उम्मीदें जगी हैं। टीम ने एफआईएच प्रो लीग के आखिरी चरण में बेहतर प्रदर्शन किया और मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन जर्मनी और ओलंपिक चैंपियन नीदरलैंड के खिलाफ शानदार जीत हासिल की। उन्होंने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को दो बार हराया और शूटआउट में इंग्लैंड को भी मात दी। ये नतीजे इसलिए भी अहम हैं क्योंकि इस विश्व कप में भारत को इंग्लैंड और पाकिस्तान के साथ ही पूल डी में रखा गया है। वेल्स के खिलाफ़ कल होने वाले शुरुआती मैच में आसान जीत टीम के मोमेंटम और कॉन्फिडेंस के लिए अच्छी रहेगी, खासकर इंग्लैंड 17 अगस्त और कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ 19 अगस्त को होने वाले अगले मैचों के लिए। छोटा पूल स्टेज होने के कारण लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि हर नतीजे का असर शुरुआती दौर के बाद भी पड़ सकता है। टूर्नामेंट का प्रारूप ही एक अलग तरह की रणनीतिक चुनौती पेश करता है। पिछले टूर्नामेंट्स के उलट, 2026 वर्ल्ड कप में पारंपरिक क्वार्टर-फ़ाइनल स्टेज नहीं होगा।पहले स्टेज में चार पूल्स में से हर एक की टॉप दो टीमें सेमीफाइनल की दौड़ में बनी रहेंगी। दूसरे फेज में पूल ई और एफ में शुरुआती स्टेज की टॉप आठ टीमें होंगी, जबकि बाकी आठ टीमें पूल जी और एच में क्लासिफ़िकेशन के लिए खेलेंगी। दूसरे फ़ेज के पूल ई और एफ में शीर्ष दो पर रहने वाली टीमें सेमीफाइनल के लिए क्वालिफाई करेंगी। सबसे अहम बात यह है कि टीमें अपने ओरिजिनल पूल से क्वालिफाई करने वाली दूसरी टीम के खिलाफ़ हासिल किए गए नतीजे और अंकों को आगे भी साथ लेकर चलेंगी, जिससे पहले फ़ेज का हर मैच बहुत अहम हो जाता है।
भारत के लिए अनुभव एक बड़ी ताकत होगी। मनदीप सिंह और मनप्रीत सिंह अपना चौथा वर्ल्ड कप खेलेंगे। मनप्रीत, जिन्होंने भारत के लिए रिकॉर्ड 417 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले हैं, इस टूर्नामेंट में सबसे अधिक मैच खेलने वाले खिलाड़ी भी होंगे। उनके साथ हरमनप्रीत, हार्दिक सिंह, अमित रोहिदास, विवेक सागर प्रसाद, सुमित और नीलाकांता शर्मा मिलकर एक अनुभवी कोर बनाते हैं, जो बड़ी चैंपियनशिप के दबाव में टीम को गाइड करने में सक्षम है।इस अनुभव के साथ नए चेहरे और युवा जोश का भी अच्छा तालमेल है। भारत की टीम में आठ खिलाड़ी ऐसे हैं जो पहली बार वर्ल्ड कप खेल रहे हैं, हालांकि ज़्यादातर खिलाड़ी पहले से ही नेशनल सेटअप का हिस्सा रहे हैं। सीनियर इंटरनेशनल अनुभव के मामले में 23 साल के मिडफील्डर आदित्य अर्जुन लालागे अपवाद हैं, जिन्होंने अब तक 13 मैच खेले हैं।
टीम के मुख्य कोच क्रेग फ़ुलटन ने कहा, “हमारी ताकत हमारी विविधता है। हमारे पास टूर्नामेंट लेवल, ओलंपिक और विश्व कप का अनुभव है और साथ ही कुछ युवा खिलाड़ी भी हैं जिन्होंने अंडर-21 स्तर पर अच्छा प्रदर्शन किया है और पिछले 18 महीनों में इस ग्रुप में जगह बनाई है। हम इस मिक्सचर को लेकर उत्साहित हैं।”डिफेंडर यशदीप सिवाच के लिए यह मौका खास तौर पर निजी महत्व वाला होगा। वह उस देश में अपना विश्व कप पर्दापण करेंगे जहां उनकी मां, प्रीतम सिवाच, भी विश्व कप में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। जिससे हॉकी की विरासत की इस बड़ी कहानी में एक अनोखा पारिवारिक पहलू भी जुड़ जाएगा।। भारत के दोनों गोलकीपर, सूरज करकेरा और मोहित एचएस, अपने पहले विश्व कप में हिस्सा लेंगे और उन पर अंतरराष्ट्रीय हॉकी की सबसे मुश्किल भूमिकाओं में से एक की जिम्मेदारी होगी।
यह टीम अलग-अलग पीढ़ियों का संगम है। अनुभवी खिलाड़ी जो इंटरनेशनल गेम की ज़रूरतों को समझते हैं और होनहार खिलाड़ी जो अपनी छाप छोड़ने के लिए उत्सुक हैं। हरमनप्रीत की अगुवाई, मनप्रीत का बहुत ज़्यादा अनुभव और हार्दिक, अमित, विवेक, सुमित और नीलकंठ का शांत स्वभाव टीम की मजबूत नींव बनाते हैं। वहीं, राजिंदर सिंह, आदित्य, यशदीप और शिलानंद लाकरा जैसे खिलाड़ी नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें जरमनप्रीत सिंह, संजय, दिलप्रीत, अभिषेक और जुगराज सिंह जैसे अनुभवी खिलाड़ियों का साथ मिलता है।जिस देश ने अपना एकमात्र वर्ल्ड कप खिताब जीतने के बाद 51 साल तक इंतजार किया हो, उसके लिए इस टूर्नामेंट में हर बार वापसी पर 1975 की यादें ताज़ा हो जाती हैं। फिर भी, इस भारतीय टीम को अतीत को दोहराने की ज़रूरत नहीं है। उनके पास अतीत का सम्मान करने का मौका है । उसी जोश, मज़बूती और भरोसे के साथ खेलकर, जिसने कभी अजीत पाल सिंह की टीम को कामयाबी दिलाई थी।
फुल्टन ने कहा, “अगर आप ओलंपिक में भारत के इतिहास को देखें, तो वह बहुत ही शानदार रहा है। लेकिन हमने आखिरी बार 51 साल पहले वर्ल्ड कप जीता था। इसलिए हम भारतीय इतिहास में अपना एक नया अध्याय लिखना चाहते हैं। यही हमारा बड़ा लक्ष्य है।”