सावन पर पेड़ों की डालियों पर पड़े झूलों की जगह ली मोबाइल फोन पर बनती रीलों ने

सावन पर पेड़ों की डालियों पर पड़े झूलों की जगह ली मोबाइल फोन पर बनती रीलों ने

जालौन, 17 अगस्त । बुंदेलखंड में सावन का महीनो कभी लोक संस्कृति, सामाजिक मेलजोल और पारंपरिक उत्सवों का जीवंत प्रतीक माना जाता था मगर बदलते परिवेश में अब पेड़ों की डालियों पर झूलों की जगह मोबाइल की स्क्रीन पर सावन की रीलें अधिक दिखाई देने लगी हैं। दो दशक पहले तक सावन के आते ही गांवों की तस्वीर बदल जाती थी। आम, नीम और बरगद की मजबूत डालियों पर रस्सियों के झूले पड़ते थे, कजरी गीतों की स्वर लहरियां वातावरण में गूंजती थीं और सखियों की टोली घंटों झूला झूलते हुए सावन की मस्ती में डूबी रहती थी। लेकिन बदलते समय, आधुनिक जीवनशैली और मोबाइल फोन के बढ़ते प्रभाव ने इस सांस्कृतिक विरासत को धीरे-धीरे गांवों से दूर कर दिया है।ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं का कहना है कि कभी सावन का अर्थ ही झूला और कजरी हुआ करता था। जालौन की नीलम सैनी बताती हैं कि पहले सावन के दिनों में गांव की बेटियां और महिलाएं एक स्थान पर एकत्र होती थीं। कोई झूला डालता था तो कोई कजरी का गीत छेड़ देती थी और देखते ही देखते पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता था। संध्या पुरवार और माया पुरवार भी अपने बचपन की यादें साझा करते हुए बताती हैं कि आम और नीम के पेड़ों पर पड़े झूलों के लिए बच्चों और युवतियों में विशेष उत्साह रहता था। झूले पर बैठकर कजरी गाना, सहेलियों के साथ हंसी-मजाक करना और बारिश की फुहारों का आनंद लेना सावन की पहचान हुआ करता था। गांव की चौपालों से लेकर घरों के आंगनों तक हर जगह सावन की रौनक दिखाई देती थी।

लोक संस्कृति के जानकारों का कहना है कि सावन और कजरी का रिश्ता सदियों पुराना है। अर्चना कुलश्रेष्ठ बताती हैं कि बारिश की बूंदों के बीच जब महिलाओं की टोली कजरी गाती थी तो पूरा गांव लोक संस्कृति की मिठास में डूब जाता था। इन गीतों में मायके की याद, साजन का इंतजार, प्रेम, मिलन और विरह जैसी भावनाएं झलकती थीं। पहले शाम होते ही महिलाएं किसी एक स्थान पर जुटती थीं और देर रात तक सामूहिक रूप से कजरी गायन होता था। लेकिन अब टेलीविजन, मोबाइल और सोशल मीडिया ने उस सामूहिक परंपरा की जगह ले ली है। परिणामस्वरूप लोकगीत घर-घर की पहचान बनने के बजाय मंचीय कार्यक्रमों और सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित होते जा रहे हैं।सावन में हाथों पर मेंहदी रचाने की परंपरा भी अब बदलाव के दौर से गुजर रही है। पहले युवतियां और महिलाएं एक-दूसरे के हाथों में मेंहदी लगाती थीं। किसी की हथेली पर फूलों की आकृतियां बनती थीं तो किसी के हाथों पर बेल-पत्तियों की सुंदर डिजाइन उभरती थी। मेंहदी लगाने के बहाने घंटों बातचीत, हंसी-मजाक और गीत-संगीत का दौर चलता था। आज बाजार में तैयार मेंहदी और आधुनिक डिजाइन आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन सामूहिक रूप से बैठकर मेंहदी रचाने की वह आत्मीयता और अपनापन कम होता जा रहा है। सावन तो आता है, बारिश भी होती है, लेकिन पहले जैसी मेंहदी की रंगत और उत्सव का सामूहिक आनंद अब कम दिखाई देता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार सावन के झूलों के कम होने का एक बड़ा कारण गांवों में पुराने पेड़ों की संख्या में आई कमी भी है। जिन आम, नीम और बरगद के पेड़ों की मजबूत डालियों पर पीढ़ियां झूला झूलती थीं, उनमें से अनेक पेड़ अब नहीं रहे। ग्रामीण क्षेत्रों में पक्के मकानों का विस्तार, सड़क निर्माण और बदलते परिवेश के कारण पेड़ों की संख्या घटती गई, जिसके साथ झूलों के लिए उपयुक्त स्थान भी कम होते गए। वहीं नई पीढ़ी का अधिकांश समय मोबाइल और सोशल मीडिया पर बीतने लगा है। पहले जो समय पेड़ों की छांव में झूला झूलने, लोकगीत गाने और रिश्तों को मजबूत करने में व्यतीत होता था, वह अब मोबाइल की स्क्रीन पर गुजर रहा है। सोशल मीडिया पर सावन के झूले और कजरी जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन गांवों की वास्तविक तस्वीर पहले जैसी नहीं रह गई है।बुजुर्गों का मानना है कि सावन की असली खूबसूरती केवल बादलों और बारिश में नहीं, बल्कि उन रिश्तों और सामाजिक जुड़ाव में थी जो झूले की एक रस्सी से बंध जाते थे। उनका कहना है कि आधुनिकता के साथ-साथ लोक परंपराओं को भी बचाने की आवश्यकता है। इसके लिए गांवों में सावन झूला उत्सव, कजरी गायन प्रतियोगिताएं और मेंहदी कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। साथ ही अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएं ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उन झूलों का आनंद ले सकें, जो कभी बुंदेलखंड की पहचान हुआ करते थे। उनका मानना है कि जब पेड़ों पर फिर झूले पड़ेंगे, हाथों में फिर मेंहदी रचेगी और गांव की गलियों में कजरी की आवाज गूंजेगी, तभी सावन के साथ बुंदेलखंड की लोक संस्कृति की वह पुरानी रंगत भी लौट सकेगी, जो समय के साथ धुंधली पड़ती जा रही है।

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