
चित्रकूट, 18 अगस्त (वार्ता) रामचरितमानस की रचना कर भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र को जन-जन तक पहुंचाने वाले महाकवि और संत गोस्वामी तुलसीदास भारतीय भक्ति साहित्य के ऐसे महान स्तंभ हैं, जिनकी कृतियां आज भी करोड़ों लोगों के जीवन का मार्गदर्शन करती हैं। तुलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जनपद स्थित राजापुर कस्बे में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ माना जाता है। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी देवी बताया जाता है।
लोकमान्यताओं के अनुसार तुलसीदास जन्म से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। कहा जाता है कि जन्म लेते ही उनके मुख से रोने के स्थान पर “राम” नाम निकला था, जिसके कारण उनका बाल्यकाल का नाम “रामबोला” पड़ा। जन्म के कुछ समय बाद ही उनकी माता का निधन हो गया और प्रतिकूल परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण चुनिया नामक महिला ने किया।बाल्यावस्था में उनकी भेंट संत नरहरिदास से हुई, जिन्होंने उन्हें अपना शिष्य बनाया। गुरु के सान्निध्य में तुलसीदास ने धार्मिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर काशी में शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। विद्वान बनने के बाद वे विभिन्न स्थानों पर रामकथा का वाचन और प्रवचन करने लगे।
तुलसीदास का विवाह रत्नावली से हुआ था। जनश्रुतियों के अनुसार वे अपनी पत्नी से अत्यंत स्नेह करते थे। एक बार जब रत्नावली मायके गई हुई थीं, तब उनके वियोग में व्याकुल तुलसीदास रात के समय उफनती यमुना पार कर उनसे मिलने पहुंच गए।किंवदंती है कि तुलसीदास की अत्यधिक आसक्ति देखकर रत्नावली ने उन्हें झिड़कते हुए कहा—
“अस्थि चर्ममय देह मम, तामे ऐसी प्रीति।ऐसी जो श्रीराम महं, होत न तव भवभीति।।”
बताया जाता है कि पत्नी के इन शब्दों ने तुलसीदास के जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने सांसारिक मोह का त्याग कर भगवान राम की भक्ति को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया।लोककथाओं के अनुसार भगवान राम के दर्शन की लालसा में भटक रहे तुलसीदास को एक प्रेत ने हनुमानजी के दर्शन का मार्ग बताया। कहा जाता है कि एक रामकथा में उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के चरण पकड़ने को कहा गया जो सबसे पहले आए और सबसे बाद में जाए। तुलसीदास ने ऐसा ही किया और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर हनुमानजी ने उन्हें दर्शन दिए।
हनुमानजी के निर्देश पर तुलसीदास चित्रकूट पहुंचे और वहीं साधना करने लगे। मान्यता है कि चित्रकूट में भगवान राम और लक्ष्मण उनके सामने से गुजरे, लेकिन वे उन्हें पहचान नहीं सके। बाद में हनुमानजी ने उन्हें पुनः अवसर मिलने का संकेत दिया।कहा जाता है कि एक दिन जब तुलसीदास मंदाकिनी तट पर चंदन घिस रहे थे, तब भगवान राम, लक्ष्मण और सीता उनके समक्ष आए। उसी समय हनुमानजी ने तोते का रूप धारण कर प्रसिद्ध पंक्तियां कहीं—
“चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़।तुलसीदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर।।”
इसके बाद तुलसीदास ने अपने आराध्य प्रभु के दर्शन किए और उनका जीवन धन्य हो गया। हनुमानजी की प्रेरणा से तुलसीदास ने भगवान राम के जीवन और आदर्शों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का संकल्प लिया। संवत 1631 में उन्होंने रामचरितमानस की रचना प्रारंभ की और लगभग दो वर्ष सात माह 26 दिन में इसे पूर्ण किया। यह ग्रंथ अवधी भाषा में रचित होने के कारण आम जनमानस तक आसानी से पहुंचा और देखते ही देखते घर-घर में पूजनीय बन गया।रामचरितमानस ने न केवल धार्मिक चेतना को नई दिशा दी, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य पर भी गहरा प्रभाव छोड़ा। आज भी यह ग्रंथ करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है।
तुलसीदास की जन्मस्थली राजापुर में आज भी उनसे जुड़ी अनेक स्मृतियां सुरक्षित हैं। स्थानीय परंपराओं के अनुसार रामचरितमानस की एक प्राचीन हस्तलिखित प्रति का अंश यहां संरक्षित है, जिसके दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु आते हैं।वर्तमान में तुलसीदास की परंपरा से जुड़े उत्तराधिकारी इस धरोहर का संरक्षण कर रहे हैं। राजापुर और चित्रकूट क्षेत्र में तुलसीदास केवल एक कवि या संत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और रामभक्ति के अमर प्रतीक के रूप में स्मरण किए जाते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास की रचनाएं आज भी भारतीय समाज को मर्यादा, भक्ति, समरसता और नैतिक मूल्यों का संदेश देती हैं। रामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने भगवान राम के आदर्शों को जिस प्रकार जन-जन तक पहुंचाया, उसी कारण वे भारतीय साहित्य और भक्ति परंपरा में सदैव अमर रहेंगे।