
प्रयागराज, 25 अगस्त । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ अतिरिक्त रूप से स्कार्फ यानी हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली नाबालिग मुस्लिम छात्रा सुकैना रिजवी की याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुनाया।याचिकाकर्ता प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की छात्रा है। उसने हाईस्कूल की परीक्षा इसी स्कूल से पास की थी और कक्षा 11 में प्रवेश लेना चाहती थी। छात्रा का कहना था कि वह कक्षा छह से स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनकर आती रही है और इस पर पहले कभी आपत्ति नहीं जताई गई। इसके समर्थन में उसने अपना आईडी कार्ड तथा कक्षा आठ, नौ और दस की समूह तस्वीरें भी अदालत में पेश कीं।
याचिका के अनुसार कक्षा 11 में प्रवेश के समय स्कूल प्रबंधन ने स्कार्फ पहनकर आने को ड्रेस कोड का उल्लंघन बताते हुए उसे इस तरह स्कूल आने की अनुमति देने से इंकार कर दिया। इसके बाद छात्रा ने 14 मई और 10 जून को जिलाधिकारी प्रयागराज को शिकायतें दीं। जिलाधिकारी ने मामले में जिला विद्यालय निरीक्षक से रिपोर्ट मांगी। सहायक जिला विद्यालय निरीक्षक ने दोनों पक्षों को बुलाकर सुनवाई की।सुनवाई के दौरान स्कूल की प्रधानाचार्या ने कहा कि टैगोर पब्लिक स्कूल सह-शिक्षा संस्था है, जहां सभी समुदायों के बच्चे पढ़ते हैं और सभी विद्यार्थियों के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू है। उनका कहना था कि किसी एक छात्रा को विशेष छूट देने से स्कूल की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
छात्रा की ओर से अदालत में दलील दी गई कि स्कार्फ पहनना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है और यह उसकी गरिमा तथा शारीरिक स्वायत्तता से भी जुड़ा है। यह भी तर्क दिया गया कि स्कार्फ पहनना उसके धार्मिक आचरण का हिस्सा है और इससे रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 19(1)(ए) के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।राज्य सरकार और सीबीएसई की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने इसका विरोध करते हुए कहा कि स्कूल एक निजी गैर-सहायता प्राप्त संस्था है, जो राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण के अधीन नहीं आती। यूनिफॉर्म तय करना स्कूल प्रशासन की नीति का विषय है और इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच एकरूपता बनाए रखना है। उनके अनुसार इसमें धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई ड्रेस कोड समान रूप से लागू हो, नेक नीयती से बनाया गया हो, गैर-भेदभावपूर्ण हो तथा अनुशासन और संस्थागत पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से हो, तो निर्धारित यूनिफॉर्म तय करना मुख्यतः स्कूल के अधिकार क्षेत्र में आता है।अदालत ने कहा कि छात्रा भले ही निचली कक्षाओं में बिना रोक-टोक के स्कार्फ पहनती रही हो, लेकिन इससे उसे यह स्थायी या प्रवर्तनीय अधिकार नहीं मिल जाता कि स्कूल अपनी यूनिफॉर्म नीति में बदलाव करने के लिए बाध्य हो। अदालत के अनुसार पहले आपत्ति नहीं जताया जाना ढिलाई, लापरवाही, इच्छाशक्ति की कमी या शालीनता का परिणाम भी हो सकता है और इससे स्कूल द्वारा बाद में अपने नियम को सख्ती से लागू करने पर रोक का सिद्धांत लागू नहीं होता।
अदालत ने यह भी कहा कि स्कूल यूनिफॉर्म अनुशासन, विद्यार्थियों के बीच समानता, संस्थागत पहचान और धर्मनिरपेक्ष माहौल को बढ़ावा देती है, क्योंकि यह सभी धर्मों के विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू होती है। व्यक्तिगत छात्रों को अपनी इच्छा के अनुसार यूनिफॉर्म में बदलाव की अनुमति देने से यूनिफॉर्म की मूल अवधारणा ही प्रभावित होगी।हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने केवल यह दावा किया है कि वह बचपन से स्कार्फ पहनती आ रही है, लेकिन यह साबित करने के लिए कोई धार्मिक ग्रंथ या अन्य सामग्री पेश नहीं की गई कि स्कार्फ पहनना उसके धर्म का अनिवार्य हिस्सा है और इसके बिना उसकी धार्मिक आस्था प्रभावित होगी। अदालत ने यह भी नोट किया कि प्रस्तुत तस्वीरों में उसी धार्मिक समुदाय की अन्य छात्राएं स्कार्फ पहने हुए नहीं दिखाई दीं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि स्कूल छात्रा की आस्था की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है, बल्कि संस्थागत अनुशासन का पालन कराने की मांग कर रहा है, जिसमें निर्धारित यूनिफॉर्म अनिवार्य हिस्सा है। छात्रा के अधिवक्ताओं ने कहा कि वे हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं और फिलहाल आदेश का अध्ययन कर रहे हैं। परिवार से विचार-विमर्श के बाद फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर निर्णय लिया जाएगा।इस बीच याचिकाकर्ता छात्रा ने कक्षा 11 में दाखिला ले लिया है। उसने कोर्ट के आदेश का पालन करने और स्कूल द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड में ही कक्षाओं में जाने की बात कही है।