
वाराणसी, 2 सितंबर। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वनस्पति विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि मिट्टी में पाए जाने वाले लाभकारी बैक्टीरिया गेहूं के पौधों को रोग और आपसी प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न तनाव का सामना करने में अधिक सक्षम बना सकते हैं।डॉ. प्रशांत सिंह के नेतृत्व में किए गए इस शोध में बंडाना देवी, निधि यादव और नंदिता दुबे भी शामिल हैं। शोध अंतरराष्ट्रीय क्यू-1 वैज्ञानिक पत्रिका ‘फिजियोलॉजिकल एंड मॉलिक्यूलर प्लांट पैथोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने पौध वृद्धि को बढ़ावा देने वाले जड़-क्षेत्रीय लाभकारी बैक्टीरिया (पीजीपीआर), विशेष रूप से ‘बैसिलस अमाइलोलिक्वेफेशियन्स’ का उपयोग किया। गेहूं के पौधों को ‘बाइपोलैरिस सोरोकिनियाना’ फफूंद से संक्रमित करने के साथ अलग-अलग घनत्व पर उगाया गया, जिससे विभिन्न स्तर का प्रतिस्पर्धात्मक तनाव पैदा हुआ। अध्ययन में पाया गया कि बैक्टीरिया से उपचारित पौधों ने बिना उपचार वाले पौधों की तुलना में बेहतर वृद्धि दिखाई और रोग संक्रमण के बाद भी अधिक प्रतिरोध बनाए रखा।
अध्ययन में पाया गया कि लाभकारी बैक्टीरिया पौधे की रक्षा प्रणाली को पहले से तैयार कर देते हैं, जिसे ‘डिफेंस प्राइमिंग’ कहा जाता है। रोगजनक के हमले के समय ऐसे पौधे तेजी से और अधिक प्रभावी ढंग से अपनी रक्षा प्रणाली सक्रिय कर पाते हैं। शोधकर्ताओं ने पीआर-1 और पीआर-3 जैसे प्रमुख रक्षा जीनों के नियामक क्षेत्रों में डीएनए मिथाइलेशन में बदलाव भी पाया, जिससे बैक्टीरिया द्वारा पौधे की रक्षा प्रणाली को एपिजेनेटिक स्तर पर प्रभावित करने के संकेत मिले हैं।शोधकर्ताओं के अनुसार, वास्तविक कृषि परिस्थितियों में फसलों को रोग के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा, पोषक तत्वों की कमी और तापमान में बदलाव जैसे कई तनावों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में लाभकारी सूक्ष्मजीवों के माध्यम से पौधों की प्राकृतिक रक्षा क्षमता और तनाव-सहिष्णुता बढ़ाना टिकाऊ कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है।