
कानपुर, 17 सितंबर । अनुदानित महाविद्यालयों में संचालित स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों में कार्यरत शिक्षकों ने सेवा सुरक्षा, सम्मानजनक मानदेय और सेवा विनियमन की मांग को लेकर आंदोलन तेज कर दिया है। संगठन से जुड़े शिक्षकों ने प्रदेश के विभिन्न जिलों में जिलाधिकारियों के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर अपनी मांगों के समाधान की मांग की है। शिक्षकों का दावा है कि प्रदेश के 331 अनुदानित महाविद्यालयों में करीब 25 वर्षों से संचालित स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों की व्यवस्था में लगभग तीन हजार असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत हैं। उनके अनुसार वर्ष 2000 में शुरू हुई इस व्यवस्था के तहत शिक्षक यूजीसी की निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप चयनित होकर वर्षों से शिक्षण कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनकी सेवाओं की स्थिरता और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकी है।संगठन का कहना है कि शिक्षक पिछले करीब नौ वर्षों से सेवाओं के विनियमन अथवा यूजीसी वेतनमान दिए जाने के साथ सेवा सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। शासन स्तर पर मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने के कारण अब विभिन्न जिलों में जिलाधिकारियों के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजे जा रहे हैं।
शिक्षकों ने स्पष्ट किया कि वे सरकार की शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना के उद्देश्य के विरोधी नहीं हैं। उनका कहना है कि पिछले 25 वर्षों से लंबित सेवा संबंधी समस्याओं के समाधान की मांग सरकार तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए योजना के बहिष्कार के माध्यम से विरोध दर्ज कराया जा रहा है।संगठन के अनुसार पिछले चार वर्षों में शासन और जनप्रतिनिधियों को हजारों पत्र भेजे जा चुके हैं। संगठन अध्यक्ष डॉ. अरुणेश अवस्थी द्वारा 50 से अधिक जनप्रतिनिधियों के समर्थन पत्र भी शासन को भेजे गए हैं। शिक्षकों का कहना है कि उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय के समक्ष भी कई अवसरों पर मामला रखा गया तथा विधान परिषद, विधानसभा, विनियमन समिति और याचिका समिति सहित विभिन्न स्तरों पर उनकी समस्याएं उठाई गई हैं।
शिक्षकों के अनुसार स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों में कार्यरत अनेक शिक्षक 45 से 60 वर्ष की आयु तक पहुंच चुके हैं और लंबे समय से कम मानदेय पर काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि सेवा विनियमन, यूजीसी वेतनमान अथवा जीविकोपार्जन के लिए निश्चित एवं सम्मानजनक मानदेय की मांग लंबे समय से लंबित है। संगठन ने यह भी दावा किया कि स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों से लिए जाने वाले शुल्क और शुल्क प्रतिपूर्ति के कारण सरकार पर पड़ने वाले अतिरिक्त राजस्व व्यय पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। संगठन के अनुसार शुल्क प्रतिपूर्ति के कारण प्रतिवर्ष 82 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त राजस्व व्यय होता है।शिक्षकों की प्रमुख मांग है कि अनुदानित महाविद्यालयों में संचालित स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों की दोहरी व्यवस्था समाप्त कर संबंधित विषयों को अनुदान पर लिया जाए और यूजीसी की निर्धारित योग्यता के अनुरूप कार्यरत शिक्षकों की सेवाओं को नियमानुसार विनियमित अथवा संरक्षित किया जाए। वैकल्पिक रूप से उन्हें यूजीसी वेतनमान के अनुरूप निश्चित एवं सम्मानजनक मानदेय देते हुए सेवा सुरक्षा प्रदान की जाए।
शिक्षकों का कहना है कि स्वास्थ्य सुविधा के साथ रोजगार और सेवा सुरक्षा भी सम्मानजनक जीवन के लिए आवश्यक है। इसी क्रम में छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय से संबद्ध कानपुर जनपद के महाविद्यालयों में कार्यरत स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों के शिक्षकों ने भी अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन देने की प्रक्रिया शुरू की है।