पश्चिमी यूपी में 2027 की सियासी बिसात: रालोद की समरसता, तो गुर्जर बहुल इलाकों में सपा के पीडीए की बढ़ती हलचल

पश्चिमी यूपी में 2027 की सियासी बिसात: रालोद की समरसता, तो गुर्जर बहुल इलाकों में सपा के पीडीए की बढ़ती हलचल

अमरोहा, 20 सितंबर। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश का राजनीतिक तापमान तेजी से चढ़ने लगा है। एक तरफ राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के अध्यक्ष जयंत चौधरी जाट बहुल इलाकों में सामाजिक समरसता अभियान के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (सपा) किसान, खाप चौधरियों और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नए राजनीतिक फॉर्मूले से अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश में जुटी हैं।

मौजूदा क्षेत्रीय हालत के मुताबिक जाट समाज में जहां रालोद-भाजपा गठबंधन का प्रभाव कायम रखने के प्रयास जारी हैं, वहीं दूसरी ओर नोएडा , बुलंदशहर,सहारनपुर, मेरठ, हापुड़, अमरोहा और बिजनौर जैसे गुर्जर बहुल इलाकों में सपा की सक्रियता ने भाजपा के सामने अपने सामाजिक जनाधार के विस्तार की एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।

मुजफ्फरनगर में रविवार को आयोजित रालोद के सामाजिक समरसता सम्मेलन से जयंत चौधरी ने गन्ना मूल्य और समय पर भुगतान के मुद्दों को उठाकर अपने पारंपरिक जाट वोट बैंक के साथ-साथ अन्य वर्गों को जोड़ने का स्पष्ट संदेश दिया है। पार्टी की योजना जिला स्तर पर ऐसे सम्मेलनों के जरिए अपनी राजनीतिक पैठ को नए सामाजिक दायरों में फैलाने की है। तो वही दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी की रविवार को पश्चिमी यूपी की जनसभा में जमीनी राजनीति को नया मोड़ देने तथा पार्टी के ‘75 जिले-75 घोषणापत्र’ की रणनीति पर आगे बढ़ने पर जोर है। इसके तहत सपा स्थानीय समस्याओं, रोजगार, शिक्षा, बिजली और सिंचाई जैसे क्षेत्रीय मुद्दों को सीधे पीडीए एजेंडे से जोड़ रही है। पार्टी की विशेष नजर गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समुदायों पर है, ताकि गुर्जर बहुल क्षेत्रों में गठबंधन के मुकाबले अपनी सीधी बढ़त बनाई जा सके।

अब पश्चिमी यूपी की राजनीति केवल जाट बनाम गुर्जर के पुराने पारंपरिक खांचे तक सीमित नहीं रह गई है। गन्ना भुगतान और किसान हित ऐसे साझा मुद्दे हैं जो जाट, गुर्जर, मुस्लिम और अन्य कृषक समाज को एक मंच पर लाते हैं। ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही इन किसान केंद्रित मुद्दों को केंद्र में रखकर अपनी-अपनी रणनीति गढ़ रहे हैं।

2024 के लोकसभा नतीजों के बाद पश्चिमी यूपी का राजनीतिक परिदृश्य काफी बदल चुका है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने व्यापक सामाजिक आधार को बनाए रखने के साथ-साथ गुर्जर, गैर-यादव ओबीसी और दलित वर्गों में अपनी पहुंच को और मजबूती देने की है। हालांकि लोकसभा के नतीजे 2027 के विधानसभा चुनावों का सीधा पैमाना नहीं हो सकते, लेकिन वे आगामी सियासी जंग का आधार जरूर तय कर रहे हैं। फिलहाल पश्चिमी यूपी की सियासत रालोद के समरसता अभियान, सपा के व्यापक पीडीए विस्तार और एनडीए की सामाजिक संतुलन बनाए रखने की तीन समानांतर धाराओं पर आगे बढ़ रही है।

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