भविष्य में एआई कंपनियों से जुड़े जोखिम पूरे वित्तीय बाजार को प्रभावित कर सकते हैं: आरबीआई गवर्नर

भविष्य में एआई कंपनियों से जुड़े जोखिम पूरे वित्तीय बाजार को प्रभावित कर सकते हैं: आरबीआई गवर्नर

नयी दिल्ली, 03 अक्टूबर । रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शनिवार को कहा कि एआई कंपनियों में जिस प्रकार तेजी से निवेश बढ़ रहा है, भविष्य में इन कंपनियों के जुड़े जोखिम पूरे वित्तीय बाजार को प्रभावित कर सकते हैं।श्री मल्होत्रा ने यहां पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में “अनिश्चितता के युग में केंद्रीय बैंकों की भूमिका” विषय पर आयोजित एक सत्र में विशेषकर एआई से जुड़ी परिसंपत्तियों के बहुत अधिक मूल्यांकन को रेखांकित करते हुए कहा कि एआई निवेश चक्र वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए एक बड़ा मददगार रहा है। इस क्षेत्र की मजबूत कमाई से एआई से जुड़े इक्विटी के मूल्यांकन में काफी फायदा हुआ है। लेकिन, जैसे-जैसे निवेश चक्र परिपक्व होगा, एआई निवेश या कमाई में कोई भी मंदी वित्तीय परिसंपत्तियों की, खासकर एआई मूल्य श्रृंखला में, तेजी से गिरावट शुरू कर सकती है।उन्होंने कहा कि ज्यादा जोखिम उठाने की चाहत में अधिक कर्ज लेकर निवेश किया जा रहा है। आने वाले समय में यह बड़ी एआई कंपनियों के बीच घटते नकदी प्रवाह के साथ, बाजार में शेयरों की कीमतों में गिरावट और वित्तीय बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।श्री मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक कर्ज-बनाम-जीडीपी का स्तर बढ़ गया है, परिपक्वता अवधि कम हो गई है सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न तेजी से बढ़ा है। उन्होंने कहा कि इससे देशों के लिए अधिक उधार लेने की लागत से वित्तीय विकल्प कम हो सकते हैं, कॉर्पोरेट कंपनियों के लिए, सख्त वित्तीय हालात कर्ज चुकाने की क्षमता पर दबाव डाल सकते हैं। बैंकों के लिए सरकारी बॉन्ड में नुकसान उनकी बैलेंस-शीट कमजोर कर सकता है, वह भी ऐसे में जब सरकारें मुश्किल में फंसे बैंकों को मदद करने में वित्ती दबाव का सामना कर रही हैं।उन्होंने कहा कि इसके अलावा एआई् से साइबर जोखिम बढ़े हैं। एआई के आने से साइबर जोखिम, मॉडल से जुड़े जोखिम, तीसरे पक्ष पर निर्भरता, और इंसानी निगरानी तथा जवाबदेही में कमी आई है। एडवांस्ड एआई के विकास के साथ, सबसे बड़ी चिंता साइबर जोखिम को लेकर है। यह खासकर आपस में बहुत अधिक जुड़े हुए वित्तीय तंत्र के लिए है, जिसकी कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं हैबदलती वैश्विक परिस्थितियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वाशिंगटन सहमति के बाद उभरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, जिसने दशकों तक वैश्वीकरण, आर्थिक एकीकरण और सापेक्ष स्थिरता के लिए व्यापक ढांचा प्रदान किया, काफी दबाव में है। भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक बंटवारा, रणनीतिक बदलाव, व्यापार पर रोक, बार-बार सप्लाई में रुकावट, टेक्नोलॉजी में बड़े बदलाव और मौसम से जुड़े जोखिम – एक-दूसरे पर इस प्रकार असर डाल रहे हैं जिनका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है, और पुराने डेटा या संबंधों के आधार पर इनका मॉडल बनाना और भी मुश्किल है।उन्होंने कहा की वित्तीय स्थिरता बिना मुद्रास्फीति स्थिरता का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। मौद्रिक नीति को असरदार ढंग से लागू करने के लिए एक स्थिर वित्तीय तंत्र जरूरी है। इसी तरह, आर्थिक विकास की पूरी क्षमता का एहसास तभी हो सकता है जब वित्तीय तंत्र मजबूत और स्थिर हो।उन्होंने कहा कि वैश्विक वित्तीय तंत्र ने पश्चिम एशिया संघर्ष से उपजे आपूर्ति के झटके को अच्छी तरह से झेल लिया है। लेकिन, वैश्विक आर्थिक माहौल अभी भी मुश्किल बना हुआ है। इस टकराव ने महंगाई का दबाव बढ़ा दिया है और वित्तीय तंत्र की कमजोरियां बढ़ा दी हैं। हालांकि कमोडिटी की ऊंची कीमतों और बाहरी सेक्टर के दबावों के कारण भारत पर भी पश्चिम एशिया संकट का असर हुआ है, लेकिन अर्थव्यवस्था के मजबूत आधार और एक मजबूत वित्तीय तंत्र के दम पर भारत उन्हें झेलने में सफल रहा है। हालांकि उन्होंने चेताया कि आज की मजबूती का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में हम इनसे बचे रहेंगे।उन्होंने कहा कि जोखिम की प्रकृति तेजी से बाहरी, सीमा पार और आपस में जुड़ी हुई बनती जा रही है। उन्होंने कहा, “अगला वित्तीय संकट शायद किसी बैंक या वित्त से शुरू न हो। यह किसी भू-राजनैतिक घटना, साइबर हमले या प्रौद्योगिकी संबंधी विफलता से शुरू हो सकता है और कई चैनलों के जरिये वित्तीय तंत्र पर असर डाल सकता है।”इससे बचने के लिए उन्होंने पूरे तंत्र में मजबूती को जरूरी बताया। उन्होंने कहा , “एक मजबूत बैंकिंग तंत्र जरूरी तो है, लेकिन काफी नहीं है। हमें सभी सेक्टर और संस्थाओं में मजबूती चाहिए।”

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