इटावा में खलनायक नहीं, संकटमोचक के रूप में पूजे जाते हैं रावण

इटावा में खलनायक नहीं, संकटमोचक के रूप में पूजे जाते हैं रावण

इटावा, 19 अक्टूबर। देश भर की रामलीलाओं में खलनायक के रूप में चित्रित किए जाने वाले लंकापति रावण की उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के जसवंतनगर में संकटमोचक के रूप में पूजा की जाती है। यहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन करने के बजाय उसे पत्थर मारकर और लाठियों से पीटकर गिराया जाता है। इसके बाद लोग पुतले की लकड़ियां और अन्य सामग्री बीनकर अपने घर ले जाते हैं। स्थानीय मान्यता है कि इन्हें घर में रखने से विघ्न-बाधाएं दूर रहती हैं और सुख-समृद्धि आती है।जसवंतनगर की रामलीला अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण देशभर में अलग पहचान रखती है। यहां दशहरे पर रावण की पूरे कस्बे में आरती उतारी जाती है और उसकी पूजा की जाती है। रामलीला समिति के प्रबंधक राजीव गुप्ता बबलू के मुताबिक, इस रामलीला का इतिहास करीब 167 वर्ष पुराना है। इसकी शुरुआत 1855 में हुई थी, लेकिन 1857 के विद्रोह के कारण आयोजन बाधित हो गया। वर्ष 1859 से यह परंपरा लगातार जारी है।

उन्होंने बताया कि पहले रामलीला का आयोजन केवल दिन में होता था, लेकिन प्रकाश की बेहतर व्यवस्था होने के बाद रात में भी इसका मंचन शुरू हो गया। उनके पूर्वज सौराष्ट्र से यहां आए थे। बाद में उन्होंने जसवंतनगर को अपना स्थायी निवास बना लिया और रामलीला की परंपरा आगे बढ़ी।समिति के प्रबंधक राजीव गुप्ता ने बताया कि देश के अधिकांश हिस्सों में 20 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा, जबकि जसवंतनगर में रावण वध 21 अक्टूबर को पंचक मुहूर्त में होगा। यहां रामलीला की तिथियां और रावण वध का समय पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार निर्धारित किया जाता है।

जसवंतनगर के रामलीला मैदान में नवरात्र की सप्तमी को करीब 15 फुट ऊंचा रावण का पुतला स्थापित कर दिया जाता है। दशहरे के दिन शाम से राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध शुरू होता है। दोनों पक्ष डोलों पर सवार होकर युद्धलीला का प्रदर्शन करते हैं। इस दौरान रावण अपनी सेना के साथ मैदान में पहुंचता है तो उसकी धूप-कपूर से आरती उतारी जाती है और जयकारे लगाए जाते हैं।रात करीब 10 बजे पंचक मुहूर्त में रावण के स्वरूप का वध किया जाता है। इसके बाद पुतले को जलाने के बजाय पत्थरों और लाठियों से गिरा दिया जाता है। मैदान में मौजूद लोग पुतले की बांस की खपच्चियां, लकड़ियां, कपड़े और अन्य सामग्री अपने घर ले जाने के लिए जुट जाते हैं। मान्यता है कि इन वस्तुओं को घर में रखने से भूत-प्रेत का प्रकोप नहीं होता, विद्वता आती है और धन-समृद्धि बढ़ती है। रावण वध के बाद उसकी तेरहवीं भी मनाई जाती है, जिसमें कस्बे के लोगों को आमंत्रित किया जाता है। ज

जसवंतनगर की रामलीला खुले मैदान में दक्षिण भारतीय शैली में आयोजित की जाती है। इसमें रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण सहित प्रमुख पात्र तांबे, पीतल और लोहे जैसी धातुओं से बने मुखौटे पहनकर युद्धलीला का प्रदर्शन करते हैं। कलाकारों के माथे पर भगवान शिव के त्रिपुंड का तिलक भी लगाया जाता है।इन मुखौटों में रावण का मुखौटा सबसे बड़ा और आकर्षक होता है, जिसमें दस सिर जुड़े होते हैं। मुखौटों को प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता है। उनकी विशिष्ट बनावट और पारंपरिक रंग-सज्जा दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहती है।

जसवंतनगर की रामलीला को उसकी विशिष्ट शैली और परंपराओं के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। वर्ष 2010 में यूनेस्को की रामलीलाओं से संबंधित रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया गया था। त्रिनिदाद की शोधार्थी इंद्राणी रामप्रसाद ने 400 से अधिक रामलीलाओं पर शोध किया है। बताया जाता है कि उन्हें जसवंतनगर जैसी विशिष्ट परंपरा वाली रामलीला अन्यत्र देखने को नहीं मिली।रामलीला समिति के पदाधिकारियों के अनुसार, इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशिष्ट लोक परंपराएं हैं। रावण की आरती उतारने से लेकर उसके पुतले की लकड़ियां घर ले जाने और तेरहवीं मनाने तक की रस्में इसे अन्य रामलीलाओं से अलग बनाती हैं। यही वजह है कि रामलीला के दौरान भारी भीड़ जुटने के बावजूद कस्बे में यह आयोजन अपनी परंपरागत विशिष्टता के साथ संपन्न होता रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Designed and Developed by Prakhar Dixit