पूर्वोत्तर में श्रीअन्न की खेती को मिल रहा है बढ़ावा: मोदी

पूर्वोत्तर में श्रीअन्न की खेती को मिल रहा है बढ़ावा: मोदी

नयी दिल्ली, 25 अक्टूबर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत में पारंपरिक मोटे अनाज यानी श्रीअन्न (मिलेट्स) की खेती को फिर से बढ़ावा मिल रहा है।श्री मोदी ने रविवार को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में कहा कि पूर्वोत्तर भारत में पारंपरिक मोटे अनाज यानी श्रीअन्न (मिलेट्स) की खेती को फिर से बढ़ावा युवा पारंपरिक फसलों को नए उत्पादों और बाजार के अवसरों से जोड़ रहे हैं, जिससे किसानों की आय बढ़ने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि के नए रास्ते खुल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के आह्वान पर वर्ष 2023 को ‘अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष’ के रूप में मनाया गया था, जिसे दुनियाभर में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। इस पहल से लोगों को श्रीअन्न के पोषण संबंधी महत्व और भारतीय संस्कृति से इसके गहरे जुड़ाव को समझने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर भारत में भी मिलेट्स की खेती की समृद्ध परंपरा रही है, लेकिन समय के साथ लोग इससे दूर होने लगे थे। अब विभिन्न स्थानीय पहलों के कारण इस पारंपरिक फसल की खेती और इसके उत्पादों की मांग दोबारा बढ़ रही है।प्रधानमंत्री ने मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले के खांडुली गांव का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां कई पीढ़ियों से मिलेट्स स्थानीय खानपान का अहम हिस्सा रहे हैं। हालांकि, कुछ समय पहले इनकी खेती करने वाले किसानों की संख्या घटने लगी थी। ऐसे में गांव की दो सहेलियों ने मिलेट्स से नए उत्पाद तैयार करने की पहल की। उन्होंने मिलेट्स से कुकीज, केक, मफिन और शिशुओं के लिए खाद्य उत्पाद तैयार किए। इन उत्पादों के जरिए मिलेट्स का मूल्य संवर्धन हुआ, जिससे बिक्री और मांग बढ़ी। इसका सकारात्मक असर यह हुआ कि स्थानीय किसानों ने भी दोबारा मिलेट्स की खेती शुरू कर दी।

श्री मोदी ने मेघालय के पश्चिम गारो हिल्स जिले के सादोलपाड़ा गांव में हो रहे प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि किसान चेकजिंग संगमा ने मिलेट्स के महत्व को समझते हुए आधुनिक तरीकों से इसकी खेती शुरू की। इससे उनकी आय में वृद्धि हुई और गांव के अन्य लोगों में भी इस पारंपरिक फसल के प्रति जागरूकता बढ़ी। प्रधानमंत्री ने नागालैंड के कोहिमा जिले के केजोमा गांव का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां एक दशक से अधिक समय तक मिलेट्स की खेती बंद रही थी। इसके कारण गांव की एक पूरी पीढ़ी इस पारंपरिक फसल से परिचित नहीं रह गई थी, जबकि पहले उनके पूर्वज इसकी खेती करते थे। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024 में ग्रामीणों ने फिर से मिलेट्स की खेती शुरू की और वर्ष 2025 में गांव में पहला मिलेट्स महोत्सव आयोजित किया गया। अब यहां भी मिलेट्स से बने खाद्य उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है।उन्होंने कहा कि मेघालय और नागालैंड के इन गांवों के अनुभव बताते हैं कि पारंपरिक फसलों को नए उत्पादों, आधुनिक खेती और बाजार की मांग से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि युवा अपनी विरासत को सहेजते हुए नए अवसर पैदा कर रहे हैं और गांव समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

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