
नयी दिल्ली, 26 अक्टूबर । भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश पर तीखा प्रहार करते हुए उन्हें सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ज्ञान देने से गुरेज करने की अपील की है।श्री रमेश ने एक अंग्रेजी अखबार के खबर को सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि आज मतदाता सूची में गड़बड़ी और गैर-कानूनी कामों के नए खुलासे हुए। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ध्यान भटकाने की बेताब कोशिशें चुनाव आयोग और मोदी सरकार में संकट को छिपा नहीं सकतीं।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी द्वारा गड़बड़ियों का खुलासा होने के बाद आयोग ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 सीटों की वोटर लिस्ट की जांच का आदेश दिया है। आजमगढ़ में एक ही व्यक्ति का नाम लिस्ट में 13 बार आया, सिर्फ़ दो चुनाव क्षेत्रों में मिली हज़ारों गड़बड़ियों में से सिर्फ़ एक। इसके लिए आठ कनिष्ठ अधिकारियों को दोषी ठहराया जा रहा है, जबकि असली दोषियों को सज़ा नहीं मिली।उन्होंने कहा कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री की अगुवाई में कांग्रेस के विरोध के बावजूद बड़े पैमाने पर नाम हटाने के लिए फॉर्म सात का गलत इस्तेमाल जारी है। अब, चुनाव अधिकारियों के नाम पर बिना किसी ‘कारण’ के नाम हटाने के लिए 61000 फॉर्म सात के आवेदन दाखिल फाइल किए गए हैं। यह तब है जब आयोग ने गत 10 अक्टूबर को राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (सीईओ) को डैमेज कंट्रोल लेटर भेजा था, जिसका मकसद फॉर्म सात के गलत इस्तेमाल को रोकना था।
श्री रमेश ने कहा कि हर गुज़रता दिन मुख्य चुनाव आयोग (सीईओ) ज्ञानेश कुमार द्वारा प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री के कहने पर किए गए बड़े पैमाने पर, केंद्रीकृत हेरफेरके नए सबूत सामने ला रहा है। उन्हें तुरंत इस्तीफ़ा दे देना चाहिए और इस खतरनाक मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को रोकना चाहिए।श्री रमेश के इस बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने एक्स पर लिखा, ” श्री जयराम जी कृपया केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर किसी के ‘मार्गदर्शन’ में आकर ज्ञान देना शुरू न करें, खासकर तब जब उन बातों के समर्थन में कोई आधिकारिक दस्तावेज न हो। अगर सुनी-सुनाई बातों की ही चर्चा करनी है, तो अपने कार्यकाल के दौरान दिल्ली के सत्ता गलियारों में न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर प्रचलित उन बेहद चर्चित कहानियों को भी याद कर लीजिए। कहा जाता है कि उस समय सबसे पहले कुछ चुनिंदा नामों की सूची श्री अहमद पटेल के पास जाती थी। कथित तौर पर वहां विचार-विमर्श इस बात पर कम होता था कि न्यायिक योग्यता के लिहाज से कौन बेहतर है और इस सवाल पर ज्यादा होता था कि ये हमारे लिए क्या करेंगे?”
भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि अगर इन कहानियों पर विश्वास किया जाए, तो इसके बाद कुछ नामों पर सहमति बनती थी। ये नाम तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास पहुंचते थे। वहां से श्रीमती सोनिया गांधी की राय ली जाती थी और उसके बाद ही नामों को अंतिम रूप दिया जाता था। अब कुछ सीधे सवाल हैं, जिनके जवाब शायद आपकी याददाश्त से मिट गए हों, लेकिन देश की स्मृति में आज भी दर्ज हैं।श्री त्रिवेदी ने बताइए कि श्री पटेल और श्रीमती गांधी के पास ऐसा कौन-सा संवैधानिक पद था, जिसके आधार पर उन्हें किसी सरकारी प्रक्रिया में कोई भूमिका मिल सकती थी? क्या न्यायाधीशों की नियुक्ति जैसे गंभीर मामले में नामों को मंजूरी देने में उनकी कोई भूमिका थी या नहीं? क्या इस कहानी को सच माना जाना चाहिए?
उन्होंने कहा कि यह बेहद विचित्र बात है कि जिन लोगों ने तीन न्यायाधीशों की वरिष्ठता को दरकिनार कर एक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की और ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ की बात की, वे आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर लंबे-लंबे उपदेश दे रहे हैं, लेकिन उनके अपने कार्यकाल में न्यायाधीशों की नियुक्तियों से जुड़े इन सवालों पर कोई चर्चा नहीं होती। उन्होंने एक ऐसी कहानी सुनाई है, जिसके समर्थन में न तो अदालत के रिकॉर्ड में और न ही सरकारी अभिलेखागार में कोई आधिकारिक दस्तावेज मौजूद है।भाजपा प्रवक्ता ने कहा, “मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि सरकारी रिकॉर्ड और अदालती दस्तावेजों में क्या दर्ज है। आपने 1967-68 में एक ऐसे व्यक्ति को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया था, जिनके पास कानून की डिग्री तक नहीं थी। उनका नाम था भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति कैलाश नाथ वांचू।”
गौरतलब है कि न्यायमूर्ति कैलाश नाथ वांचू आईसीएस अधिकारी थे और फरवरी 1947 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कार्यवाहक न्यायाधीश बने थे। वह 1951 राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने। वह 1958 में उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में प्रोन्नत हुए थे।श्री त्रिवेदी ने कहा कि क्या आप देश को बता सकते हैं कि उस समय कानून की उच्च डिग्रियां रखने वाले कई योग्य न्यायाधीशों को दरकिनार कर बिना कानून की डिग्री वाले व्यक्ति को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने के पीछे कौन-सी योग्यताएं थीं? यह किसी किताब या अखबार में छपी महज एक कहानी नहीं है, बल्कि नियुक्ति से जुड़ा आधिकारिक विवरण है, जो भारत के सरकारी रिकॉर्ड और उच्चतम न्यायालय के दस्तावेजों में दर्ज है।