
तेल अवीव, 29 अक्टूबर । इज़रायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू देश के सबसे अहम चुनावों में से एक में बहुमत नहीं मिलने के बाद कमजोर पड़ गए हैं। उनके गठबंधन को संसदीय बहुमत नहीं मिल पाया है जो यह दर्शाता है कि अक्टूबर 2023 में हमास के हमले के बाद लोगों ने बदलाव के लिए वोट दिया है।
श्री नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उनके धुर-दक्षिणपंथी तथा कट्टर-रूढ़िवादी सहयोगियों को 90 प्रतिशत वोटों की गिनती के बाद, 120 सदस्यों वाली नेसेट (संसद) में 53 सीटें मिलने का अनुमान है। पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को 48 सीटें मिलने की संभावना है जबकि अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों को 19 सीटें मिल सकती हैं, जिससे गठबंधन की बातचीत में उनकी भूमिका निर्णायक हो सकती है। सरकार बनाने और शासन चलाने के लिए जरूरी 61 सीटों के आंकड़े तक इनमें से कोई भी मुख्य गठबंधन फिलहाल पहुंचता नहीं दिख रहा है।मतगणना पूरी होने के बाद अंतिम परिणाम आने की उम्मीद है। श्री नेतन्याहू और श्री आइजेनकोट दोनों ने कहा है कि वे अगली सरकार बनाने की कोशिश करेंगे। राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने राजनीतिक दलों से एक और चुनाव से बचने की अपील की है। उम्मीद है कि वे गठबंधन बनाने के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार को चुनने से पहले दलों से चर्चा करेंगे, जिसके बाद उस उम्मीदवार के पास सरकार बनाने के लिए 28 दिन का समय होगा।
उम्मीद है कि श्री नेतन्याहू विपक्षी सांसदों से समर्थन मांगेंगे हालांकि कई पार्टियों ने उनके साथ मिलकर मिली-जुली सरकार बनाने से इनकार कर दिया है। वहीं श्री आइसेनकोट को यह तय करना है कि क्या वह अरब-इजरायली पार्टियों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करें; इन पार्टियों का समर्थन बहुत अहम हो सकता है लेकिन उनके अपने ही गुट के कुछ लोग इस तालमेल का विरोध कर रहे हैं। विपक्षी नेता यायर गोलान ने अन्य पार्टियों से अपील की है कि वे श्री नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए अरब-नेतृत्व वाले गुटों के साथ मिलकर काम करें।
अरब-इजरायली दलों का कहना है कि श्री नेतन्याहू को सत्ता में लौटने से रोकने के लिए उनके मतदाता बड़ी संख्या में बाहर निकले। उनका तर्क है कि उनके चुनावी समर्थन से विपक्ष को सरकार बनाने का मौका मिलता है। ‘जॉइंट अरब लिस्ट’ के नेता यूसुफ जबरीन ने कहा कि उनका गुट सरकार को हटाने में मदद करने के लिए तैयार है और उन्होंने विकल्प के रूप में यहूदी-अरब सहयोग का प्रस्ताव रखा।
श्री जबरिन ने एक्स पर लिखा, “खून-खराबे वाली सरकार और वर्चस्व, नस्लवाद एवं भेदभाव की राजनीति के सामने, हम एक बिल्कुल अलग विकल्प पेश करते हैं। बदलाव एक यहूदी-अरब साझेदारी के माध्यम से ही आ सकता है, एक ऐसी साझेदारी जो सच्ची हो और जिसमें दोनों पक्ष बराबर हों। इससे कम कुछ नहीं, और इससे ज़्यादा कुछ नहीं।”श्री नेतन्याहू ने विपक्षी सरकार के अरब पार्टियों पर निर्भर रहने के विचार की आलोचना की है। उनका तर्क है कि इनमें से कुछ पार्टियां इज़रायल के यहूदी और ज़ायोनी स्वरूप को ही नहीं मानतीं। चुनाव के नतीजे बताते हैं कि मतदाता दो गुटों में बंटे हुए हैं, एक तरफ वे लोग हैं जो श्री नेतन्याहू की इज़रायल को लेकर अपनाई गई कट्टर और समाज को बांटने वाली सोच में बदलाव चाहते हैं, तो दूसरी तरफ वे लोग हैं जो यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि उनकी जगह किस राजनीतिक विकल्प को लाया जाए।
इसमें दो मुख्य पक्ष हैं, पहला ‘जॉइंट अरब लिस्ट’ – जिसमें कम्युनिस्ट ‘हदाश’, धर्मनिरपेक्ष ‘ताअल’ और राष्ट्रवादी ‘बालाद’ शामिल हैं और दूसरी, एक छोटी इस्लामी पार्टी ‘राआम’। ‘राआम’ को मुख्य रूप से बेदौइन समुदाय से समर्थन मिलता है। इसके नेता मंसूर अब्बास 2021 के चुनावों के बाद, इज़रायली सत्ताधारी गठबंधन में शामिल होने वाले पहले अरब राजनेता बने। इज़रायल के ज़्यादातर अरब नागरिक उन फ़िलिस्तीनियों के वंशज हैं जो 1948 के युद्ध के बाद वहीं बस गए थे।हालाँकि विपक्ष खुद को अधिक धर्मनिरपेक्ष, उदार एवं लोकतांत्रिक बताता है लेकिन सात अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमले के बाद, विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के कई मुद्दों पर इसके दल मोटे तौर पर सरकार के साथ ही खड़े नजर आते हैं।श्री नेतन्याहू पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री बने थे और अलग-अलग कार्यकाल मिलाकर लगभग 19 वर्षों तक इस पद पर रहे हैं, इज़रायली राजनीति में सबसे अधिक ध्रुवीकरण करने वाले व्यक्तियों में से एक बने हुए हैं। उनका नेतृत्व और सुरक्षा के मोर्चे पर उनका रिकॉर्ड, चुनाव प्रचार के केंद्र में रहा है।
श्री नेतन्याहू अक्सर इज़रायल की सैन्य उपलब्धियों का उल्लेख करते हैं जिसमें हमास के वरिष्ठ नेतृत्व का खात्मा और इज़रायली क्षेत्र की सुरक्षा के लिए अभियानों का विस्तार शामिल है। श्री नेतन्याहू ने इन आक्रामक सैन्य अभियानों को क्षेत्रीय बदलाव और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़रूरी बताया है। साथ ही, वे घरेलू राजनीतिक चुनौतियों और चुनावों से पहले अपनी ताक़त दिखाने के लिए इनका इस्तेमाल करते रहे हैं।श्री नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियानों और लेबनान तथा गाजा में किए गए हमलों को अपनी सरकार की सुरक्षा नीति के सबूत के रूप में पेश किया है। हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और कब्जे वाले वेस्ट बैंक में बस्तियों का भविष्य, ये कुछ ऐसे प्रमुख मुद्दे हैं जो इस चुनाव की दिशा तय कर रहे हैं।
इज़रायली दक्षिणपंथी आम तौर पर फ़िलिस्तीनी राज्य के दर्जे का विरोध करते रहे हैं और बस्तियों के विस्तार का समर्थन करते आए हैं, जबकि वामपंथी पारंपरिक रूप से क्षेत्रीय समझौते और बातचीत के प्रति ज्यादा झुकाव रखते हैं। हालांकि, समय के साथ, जो विचार पहले मुख्य रूप से दक्षिणपंथी से जुड़े हुए थे उन्हें अब यहूदी इज़रायली मतदाताओं के बीच व्यापक स्वीकार्यता मिली है।
किसी भी बड़े गुट को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण, अरब-नेतृत्व वाली पार्टियां चुनाव में संभावित ‘किंगमेकर’ बनकर उभरी हैं। ‘जॉइंट अरब लिस्ट’ और ‘यूनाइटेड अरब लिस्ट’ (जिसे ‘राआम’ के नाम से भी जाना जाता है) यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी कि श्री नेतन्याहू सत्ता में बने रहेंगे या विपक्ष सरकार बनाने में कामयाब होगा।सहयोग को लेकर बहस तब और तेज़ हो गई जब विपक्षी नेता यायर गोलान ने विरोधी दलों से अरब-नेतृत्व वाले गुटों के साथ मिलकर काम करने का आग्रह किया ताकि एक ऐसी सरकार बनाई जा सके जो प्रधानमंत्री नेतन्याहू की जगह ले सके। श्री नेतन्याहू ने बार-बार ऐसी विपक्षी सरकार बनने की संभावना की आलोचना की है जो अरब-नेतृत्व वाले दलों पर निर्भर हो। उनका तर्क है कि इनमें से कुछ गुट इज़रायल के यहूदी और ज़ायोनी स्वरूप का विरोध करते हैं।