
भोपाल, 28 मई । मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का आज भोपाल में निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे और लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से पीड़ित थे। परिवार सूत्रों के अनुसार उन्होंने गुरुवार दोपहर लगभग 12 बजे अंतिम सांस ली। उनके परिवार में पत्नी राहत और पुत्र तैयब हैं। पिछले काफी समय से उनकी स्मरण शक्ति कमजोर हो गई थी और वे लोगों को पहचानने में भी असमर्थ हो गए थे।बशीर बद्र ने उर्दू गजल को नया अंदाज और सरल भाषा दी। उनकी शायरी में मोहब्बत, जिंदगी, दर्द और सामाजिक संवेदनाओं की झलक दिखाई देती थी। उनके कई शेर देशभर में लोकप्रिय हुए। ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’ और ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में’ जैसे शेर आज भी लोगों की जुबां पर हैं।
उन्होंने वर्ष 1969 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी। बाद में वे मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में व्याख्याता रहे। वर्ष 1974 से 1990 के बीच उनकी शायरी को देश और विदेश में व्यापक पहचान मिली। परिजनों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार आज शाम भोपाल में किए जाने की संभावना है।