
नयी दिल्ली 30 मई । रक्षा क्षेत्र में सुधारों, तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और एकीकरण को बढावा देने तथा ऑपरेशन सिंदूर के सफल संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल अनिल चौहान का शनिवार को कार्यकाल समाप्त हो गया।प्रमुख रक्षा अध्यक्ष के रूप में अपने कार्यकाल को मिलाकर जनरल चौहान ने चार दशक से भी अधिक समय तक राष्ट्र की सेवा की।
सेना से 31 मई 2021 को लेफ्टिनेंट जनरल के पद से सेवानिवृत होने के बाद सरकार ने एक बार फिर उनकी सेवाएं लेने का निर्णय करते हुए उन्हें देश का दूसरा प्रमुख रक्षा अध्यक्ष नियुक्त किया था। इसके बाद जनरल अनिल चौहान ने 30 सितम्बर 2022 को प्रमुख रक्षा अध्यक्ष का कार्यभार संभाला था।प्रमुख रक्षा अध्यक्ष का पद छोड़ने से पहले जनरल चौहान ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक जाकर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। उन्हें तीनों सेनाओं की ओर से औपचारिक ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ भी दिया गया। इसके साथ ही सेना में उनका शानदार करियर समाप्त हो गया जिसकी शुरुआत 1981 में भारतीय सेना में कमीशन मिलने के साथ हुई थी।सेना की वर्दी में अपने सफर को याद करते हुए जनरल चौहान ने इस मौके को भावुक और संतोषजनक बताया। उन्होंने कहा, “तीनों सेनाओं के ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ के साथ रिटायर होना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है। मैं इसके लिए तीनों सेनाओं और मुख्यालय एकीकृत रक्षा स्टाफ का धन्यवाद करता हूं। ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ के समापन के साथ, मैं वर्दी में अपने साथियों और हमसफ़रों को हमेशा के लिए अलविदा कहता हूं। मैंने अभी-अभी युद्ध स्मारक पर आखिरी बार वर्दी में माल्यार्पण किया है। यह उन लोगों को एक विनम्र श्रद्धांजलि है, जिन्होंने कर्तव्य निभाते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी।”
सैन्य सेवा से नागरिक जीवन में बदलाव पर उन्होंने कहा, “माल्यार्पण के बाद, मेरे दोस्तों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों ने मेरा स्वागत किया। यह वर्दी वाले जीवन से नागरिक जीवन में मेरे बदलाव का प्रतीक है। मेरा कार्यकाल बहुत संतोषजनक और बेहतरीन रहा।”जनरल चौहान को दिवंगत जनरल बिपिन रावत के बाद प्रमुख रक्षा अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गयी थी। उनकी नियुक्ति को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वह पहले ऐसे सेवा निवृत ‘थ्री-स्टार’ अधिकारी थे जिन्हें तीनों सेनाओं के सबसे पड़े पद की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। प्रमुख रक्षा अध्यक्ष और सैन्य मामलों के विभाग के सचिव के तौर पर, उन्हें सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच ज़्यादा तालमेल और एकीकरण के सरकार के विज़न को आगे बढ़ाने का काम सौंपा गया था।जनरल चौहान अपने कार्यकाल के दौरान देश में सैन्य बदलाव के मुख्य शिल्पकारों में से एक बनकर उभरे। उन्होंने बहुत समय से लंबित ‘एकीकृत थिएटर कमान’ की पहल को आगे बढ़ाया। इसका उद्देश्य ऐसी एकीकृत ऑपरेशनल कमान बनाना था, जो भविष्य के संघर्षों के दौरान तीनों सेनाओं को ज़्यादा तालमेल और कुशलता से काम करने में सक्षम बना सकें। उनके नेतृत्व में, प्रस्तावित उत्तरी, पश्चिमी और समुद्री थिएटर कमान के लिए तैयार किया गया ढांचा, अब लागू होने के काफी करीब पहुंच गया है। ढांचागत सुधारों के अलावा, उन्होंने एकीकृत लॉजिस्टिक्स, साझा खरीद प्रणालियों और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमताओं के विकास की वकालत की। उन्होंने लगातार उभरती हुई प्रौद्योगिकी जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर युद्ध उपकरणों, अंतरिक्ष-आधारित संपत्तियों, स्वायत्त प्रणालियों और ड्रोन को अपनाने की पैरवी की।
जून 1981 में 11 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिलने के बाद, जनरल चौहान ने अपने सैन्य करियर के दौरान कई तरह के ऑपरेशनल और कमान पदों की जिम्मेदारी सभाली। उन्होंने 19 इन्फैंट्री डिवीजन की भी कमान संभाली, पूर्वोत्तर में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ती कोर का नेतृत्व किया, और बाद में पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में कार्य किया, जहां उन्होंने चीन और म्यांमार के साथ सीमाओं पर भारत की ऑपरेशनल तैयारियों को पुख्ता किया।विशिष्ट सेवा के लिए उन्हें परम विशिष्ट सेवा पदक, उत्तम युद्ध सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक, सेना पदक और विशिष्ट सेवा पदक जैसे सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया। उनके कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण संचालन उपलब्धि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के रूप में सामने आई, जिसने भारत की विकसित होती त्रि-सेवा युद्ध क्षमताओं को प्रदर्शित किया। इस ऑपरेशन ने सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच बेहतर समन्वय का प्रदर्शन किया और प्रमुख रक्षा अध्यक्ष की व्यवस्था के तहत विकसित एकीकृत खुफिया, निगरानी और कमान संरचनाओं की प्रभावशीलता को उजागर किया।
रक्षा विशेषज्ञ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को सैन्य एकीकरण और संयुक्त संचालन दर्शन के एक व्यावहारिक प्रदर्शन के रूप में देखते हैं, जिसे जनरल चौहान ने लगातार बढ़ावा दिया था। इस ऑपरेशन ने वास्तविक समय में सूचना साझा करने, बहु-क्षेत्रीय ऑपरेशनों और एकीकृत सैन्य नियोजन के महत्व को और मजबूत किया, ये सभी पहलू अब भारत के विकसित होते रक्षा सिद्धांत के केंद्र बिंदु बन गए हैं।
पिछले वर्ष सितंबर में सरकार ने जनरल चौहान का कार्यकाल इस वर्ष 30 मई तक बढ़ा दिया था जिससे प्रमुख रक्षा सुधारों और सैन्य एकीकरण की पहलों के कार्यान्वयन में निरंतरता बनी रही।पद छोड़ने के साथ ही, जनरल चौहान अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ जा रहे हैं जो किसी एक ऑपरेशन से कहीं अधिक व्यापक है। उनके कार्यकाल को व्यापक रूप से देश की उच्च रक्षा प्रबंधन संरचना के कायाकल्प में तेजी लाने, तीनों सेवाओं के बीच सहयोग को मजबूत करने, और अधिक एकीकृत, प्रौद्योगिकी के तौर पर उन्नत तथा भविष्य के लिए तैयार सैन्य बल की नींव रखने का श्रेय दिया जायेगा।सरकार ने उनकी जगह प्रमुख रक्षा अध्यक्ष की जिम्मेदारी एक बार फिर तीन सितारे वाले सेवानिवृत अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल एन. एस. राजा सुब्रमणि को सौंपी है।