ठाकुरद्वारा में रालोद की विजय संकल्प महारैली को जयंत चौधरी करेंगे संबोधित

ठाकुरद्वारा में रालोद की विजय संकल्प महारैली को जयंत चौधरी करेंगे संबोधित

मुरादाबाद, 3 जून (वार्ता) पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक तासीर और सत्ता के गलियारों में समय से पहले विधानसभा चुनाव कराए जाने की तैरती अटकलों के बीच समाजवादी पार्टी (सपा) का गढ़ समझे जाने वाले मुरादाबाद का ठाकुरद्वारा क्षेत्र एक बड़े सियासी शक्ति प्रदर्शन का गवाह बनने जा रहा है।राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) की चार जून को प्रस्तावित ‘विजय संकल्प महारैली’ को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री चौधरी जयंत सिंह मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करेंगे। राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) पार्टी संगठन द्वारा ठाकुरद्वारा स्थित सनातन धर्म हिन्दू इंटर कॉलेज मैदान में अपराह्न दो बजे से होने वाली यह रैली मुरादाबाद के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी रैलियों में से एक बताई जा रही है, जिसने वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को केंद्र में रखकर जमीनी स्तर पर अपनी सांगठनिक मशीनरी को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है।यह रैली ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह पलट चुके हैं। कभी धुर विरोधी रहे रालोद और भाजपा अब एक ही पाले में खड़े हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के साथ रालोद का पुराना गठबंधन इतिहास का हिस्सा बन चुका है। इस नए गठबंधन की साख और स्वीकार्यता की अग्निपरीक्षा मुरादाबाद मंडल में होनी है, जो पारंपरिक रूप से विपक्ष का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। जयंत चौधरी इससे पहले मुजफ्फरनगर, शामली, अमरोहा, मेरठ और सहारनपुर में अपनी सियासी ताकत का परिचय दे चुके हैं, लेकिन मुरादाबाद का यह अगला पड़ाव इस क्षेत्र की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने में बेहद निर्णायक साबित होने वाला है।रालोद के इस शक्ति प्रदर्शन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक लॉबिंग और विकास में उसकी हिस्सेदारी को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। देश का सबसे समृद्ध कृषि क्षेत्र होने और देश की राजनीति को चौधरी चरण सिंह जैसे दिग्गज नेता देने के बावजूद यह क्षेत्र अक्सर उपेक्षा का शिकार महसूस करता है। जब भी बड़े औद्योगिक निवेश, पृथक हाईकोर्ट बेंच की स्थापना, केंद्रीय संस्थानों, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और मेडिकल परियोजनाओं के आवंटन की बात आती है, तो यह सवाल उठना लाजमी हो जाता है कि क्या पश्चिम उत्तर प्रदेश अपनी वास्तविक राजनीतिक ताकत के अनुरूप हिस्सेदारी पा रहा है या नहीं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कमजोरी की सबसे बड़ी वजह क्षेत्रीय नेतृत्व का तीव्र बिखराव है। अलग-अलग जिलों, स्थानीय क्षत्रपों और जटिल जातीय समीकरणों में बंटी यहां की सियासत किसी भी बड़े मुद्दे पर एक साझा एजेंडा तैयार करने में विफल रही है। नेताओं के बीच इस वैचारिक बिखराव के कारण राज्य और केंद्र स्तर पर वह सौदेबाजी या दबाव नहीं बन पाता, जो किसी क्षेत्र के चहुंमुखी विकास के लिए जरूरी है। हालांकि इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर कुछ काम जरूर हुए हैं, लेकिन व्यापक औद्योगिक क्रांति के पैमाने पर पश्चिम उत्तर प्रदेश आज भी एक मजबूत और एकजुट राजनीतिक लॉबी की कमी महसूस कर रहा है।इस क्षेत्रीय विमर्श के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक और बड़ा सवाल तेजी से तैर रहा है कि क्या राज्य में विधानसभा चुनाव अपने तय समय से पहले हो सकते हैं। इस सुगबुगाहट को हवा देने का काम केंद्र और प्रदेश सरकार दोनों की हालिया प्रशासनिक सक्रियता ने किया है, जहां विकास परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास की रफ्तार अचानक तीव्र कर दी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लगातार बड़े प्रोजेक्ट्स, औद्योगिक कॉरिडोर और एक्सप्रेसवे की सौगातें जनता को सौंपी जा रही हैं, जिसे राजनीतिक जानकार सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया न मानकर चुनाव पूर्व की बड़ी घेराबंदी के रूप में देख रहे हैं।वैश्विक स्तर पर गहराते आर्थिक दबाव, महंगाई, रोजगार और निवेश जैसे संवेदनशील मुद्दों के बीच सरकारें अक्सर राजनीतिक रूप से सबसे अनुकूल और सुरक्षित समय में नए जनादेश के लिए जनता के बीच जाने की रणनीति बनाती हैं। उत्तर प्रदेश में इस थ्योरी को तब और बल मिला जब सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को विधानसभा चुनाव के बाद कराने का रणनीतिक फैसला लेते हुए मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ा दिया। इसके साथ ही, आगामी अक्टूबर में होने वाले शिक्षक और एमएलसी चुनावों के प्रत्याशियों की घोषणा अभी से शुरू कर दी गई है, जिसे प्रशासनिक हलकों में किसी बड़े चुनावी सरप्राइज की पूर्व तैयारी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।इस बदलते परिदृश्य में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पूरी तरह चुनावी मोड में नजर आ रहे हैं। जहां भाजपा संगठन बूथ स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत करने में दिन-रात जुटा है, वहीं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार जनसभाएं कर अपने सामाजिक और ‘पीडीए’ समीकरण को धार दे रहे हैं। दूसरी ओर, आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद दलित और युवा वोट बैंक को एकजुट करने के लिए प्रदेशभर में आक्रामक रूप से सक्रिय हैं, तो बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती की अचानक बढ़ी सांगठनिक सक्रियता ने इस मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। ऐसे में मुरादाबाद के ठाकुरद्वारा से उठने वाली जयंत चौधरी की आवाज यह तय करेगी कि क्या रालोद का पारंपरिक किसान और जाट मतदाता इस नए पासा पलटने की राजनीति को पूरी तरह स्वीकार कर चुका है या फिर इस बेल्ट में कोई नया सियासी उलटफेर होने वाला है।

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