ईरानी नेताओं का अमेरिका के खिलाफ सख्त रूख

ईरानी नेताओं का अमेरिका के खिलाफ सख्त रूख

तेहरान, 05 जून । अमेरिका-ईरान सैन्य टकराव के बाद ईरानी अधिकारियों और वहाँ के अखबारों व चैनलों ने अमेरिका के प्रति बहुत कड़ा रुख अपना लिया है। यह स्थिति तब है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि दोनों देशों के बीच बातचीत सही रास्ते पर है और अभी भी समझौता हो सकता है।

तनाव की यह ताज़ा कड़ी बुधवार तड़के तब शुरू हुई जब अमेरिकी सेना ने केश्म द्वीप पर ईरान के एक संचार टावर को निशाना बनाया। इसके जवाब में ईरान ने कुवैत और बहरीन जैसे खाड़ी देशों में बने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमलों का एलान कर दिया। इस कदम से दोनों देशों के बीच चल रहे बेहद नाजुक युद्धविराम पर दबाव और बढ़ गया है, जो बार-बार के तनाव के बावजूद पिछले 56 दिनों से जैसे-तैसे चल रहा था।

कुवैत के अधिकारियों के अनुसार, ईरान के एक ड्रोन हमले ने कुवैत अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे को निशाना बनाया, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हुए हैं। हालांकि, ईरान की ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (आईआरजीसी) ने हवाई अड्डे को निशाना बनाने की बात से साफ इनकार किया है।

इस गोलाबारी और हमलों के बावजूद, अमेरिकी राष्ट्रपति ने जनता के सामने भरोसा जताया है कि बातचीत आगे बढ़ रही है और आने वाले कुछ दिनों में समझौता हो सकता है। श्री ट्रम्प ने अमेरिका के हमले को एक सज़ा की तरह बताया, जबकि ईरान के कदम को सिर्फ एक जवाबी कार्रवाई करार दिया। उनका यह रुख दिखाता है कि वे इस हिंसा के बाद भी बातचीत के रास्ते को बंद नहीं करना चाहते।

खबरों के मुताबिक, श्री ट्रम्प ने अपने सलाहकारों से कहा है कि वह इस युद्धविराम को बनाए रखना चाहते हैं। वह बड़े पैमाने पर दोबारा लड़ाई शुरू करने की बात तभी सोचेंगे, जब किसी अमेरिकी सैनिक या नागरिक की जान जाएगी। अमेरिका का यह रुख दिखाता है कि वह ईरान को डराकर भी रखना चाहता है और बातचीत की कोशिशों को टूटने से भी बचाना चाहता है।

दूसरी तरफ, ईरान की राजधानी तेहरान में माहौल बिल्कुल बदला हुआ है। ईरान के सरकारी अंग्रेजी न्यूज़ चैनल ‘प्रेस टीवी’ ने कहा है कि ईरान के सब्र का बांध अब टूट चुका है। उसने हालिया सैन्य कार्रवाई को अपनी एक नई रणनीति का हिस्सा बताया। रिपोर्ट में सीधे शब्दों में चेतावनी दी गई कि अमेरिका की किसी भी छोटी कार्रवाई का ईरान बहुत बड़े पैमाने पर जवाब दे सकता है।

ईरान के नेताओं ने भी इसी सुर में बात की है। पूर्व सांसद कामरान गजनफ़री ने अपनी ही सरकार के अधिकारियों पर आरोप लगाया कि वे बेकार की वार्ताओं के चक्कर में देश की सेना के हाथ बांध रहे हैं। उन्होंने कहा, “हमें किसी भी हाल में दुश्मन के सामने पीछे नहीं हटना चाहिए। अगर वे हमारे एक जहाज पर हमला करते हैं, तो हमें उनके तीन या चार जहाजों को उड़ा देना चाहिए।”

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी कड़े लहजे में कहा कि ईरान ने पड़ोसी देशों की सरकारों को बार-बार चेतावनी दी है कि वे अमेरिका को अपनी ज़मीन से हमला करने की इजाज़त न दें। उन्होंने साफ किया कि खाड़ी क्षेत्र के वे सभी इलाके ईरान के निशाने पर हैं जहाँ अमेरिकी सेना रुकी हुई है। उनका यह बयान कुवैत और बहरीन में अमेरिका से जुड़े ठिकानों पर हुए हमलों के बाद आया है, जिसे ईरान ने अपने केश्म द्वीप पर हुए हमले का बदला बताया है।

हालांकि अमेरिका ने इस बात से साफ इनकार किया है कि ईरान की मिसाइलें उसके सैन्य ठिकानों को कोई नुकसान पहुँचा पाई हैं, लेकिन ईरानी मीडिया ने सैटेलाइट की कुछ तस्वीरें जारी करते हुए दावा है कि ये तस्वीरें कुवैत के ‘अली अल सलेम एयर बेस’ पर हुए नुकसान को दिखाती हैं।

इस पूरी स्थिति को लेबनान में हिज्बुल्ला के खिलाफ चल रही इजरायल की जंग और उलझा रही है। ईरान ने इस मुद्दे को अमेरिका के साथ होने वाली अपनी बातचीत से जोड़ दिया है। आईआरजीसी का कहना है कि अगर कोई समझौता करना है, तो इजरायल और हिज्बुल्ला के बीच चल रही लड़ाई समेत सभी मोर्चों पर युद्ध पूरी तरह रुकना चाहिए। जबकि इजरायल और अमेरिका लेबनान के मामले को एक बिल्कुल अलग मुद्दा मान रहे हैं, जिसका ईरान की बातचीत से कोई लेना-देना नहीं है।

इजरायली सेना ने पहले से चल रहे संघर्षविराम के प्रयासों के बावजूद गुरुवार को दक्षिणी लेबनान में नए हमले किए। वहीं दूसरी ओर, हिज्बुल्लाह के प्रमुख नईम कासिम ने इजरायल और लेबनान सरकार के बीच हुए समझौतों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संगठन तभी लड़ाई रोकेगा जब इजरायली हमले पूरी तरह बंद होंगे और इजरायली सैनिक लेबनान की ज़मीन से पूरी तरह बाहर चले जाएंगे।

ईरानी मीडिया का यह भी कहना है कि लेबनान में इजरायल जो हमले कर रहा है, उसका मकसद केवल शांति की कोशिशों को नाकाम करना नहीं है, बल्कि वह यह देखना चाहता है कि ईरान और उसके साथी देश इस दबाव को कितना झेल सकते हैं।

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