ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाकर योगी सरकार ने विपक्ष और सहयोगियों की मंशा पर फेरा पानी

ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाकर योगी सरकार ने विपक्ष और सहयोगियों की मंशा पर फेरा पानी

लखनऊ, 8 जून । उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो गया, लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार ने पंचायत चुनाव कराने के बजाय 57 हजार से अधिक ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में काम जारी रखने का आदेश दे दिया है। राजनीतिक हलकों में सरकार के इस फैसले की कई तरह से समीक्षा भी हो रही है । राजनीतिक विश्लेषक इसे कानूनी फैसला कम राजनीतिक ज़्यादा मान रहे हैं।

हालांकि सरकार के इस फ़ैसले ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष इसे पंचायत चुनाव टालने की रणनीति बता रहा है, जबकि सरकार का तर्क है कि परिसीमन और आरक्षण निर्धारण का काम पूरा होने तक प्रशासनिक निरंतरता जरूरी है। उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत सरकार ने मौजूदा प्रधानों को अधिकतम छह महीने के लिए प्रशासक नियुक्त किया है।सरकार का कहना है कि पंचायत चुनाव टालने के पीछे मुख्य कारण ओबीसी आरक्षण का मुद्दा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद राज्य सरकार ने पूर्व न्यायाधीश राम औतार सिंह की अध्यक्षता में समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया है। इस आयोग की रिपोर्ट, आरक्षण निर्धारण, मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनाव प्रक्रिया को मिलाकर कई महीने लग सकते हैं।

दरअसल पंचायत चुनावों का महत्त्व केवल ग्राम प्रधान चुनने तक सीमित नहीं। प्रदेश में 58,000 से ज्यादा ग्राम पंचायतें, 8,26 क्षेत्र पंचायतें और 75 जिला पंचायतें हैं। 12 करोड़ से ज्यादा मतदाता सीधे इनसे जुड़े हैं। पंचायत चुनाव राजनीतिक दलों के लिए ग्राउंड स्तर की ताकत नापने, जातीय समीकरणों को परखने और प्रभावशाली स्थानीय नेताओं को पहचानने का सबसे बड़ा मंच होते हैं।पंचायत राज मंत्री और सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर का दावा है कि सरकार पंचायत चुनाव समय पर कराने के लिए पूरी तरह तैयार थी। उनकी माने तो मतपत्र तक छप चुके थे और मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन होने वाला था, लेकिन अगर इस मामले को अदालत में नहीं ले जाया तो पंचायत चुनाव समय पर हो जाते।श्री राजभर ने कहा कि अदालतों के हस्तक्षेप के बाद सरकार को आयोग गठित करना पड़ा। चुनाव में देरी के लिए सारा जिम्मेदार है।

राजभर ने यह भी कहा कि यहां तक संकेत दिया कि जरूरी हुआ तो प्रशासकों की व्यवस्था छह महीने से आगे भी जारी रह सकती है और पंचायत चुनाव विधानसभा चुनावों के बाद तक टल सकते हैं। हालांकि कानूनी कारणों के रूप में यह रास्ता आसान नहीं माना जा रहा, लेकिन इस बयान ने विपक्ष को सरकार के इरादों पर सवाल उठाने का अवसर दे दिया है।ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने पर एडहॉक पंचायत को प्रशासक नियुक्त करने की परंपरा है। इस बार कामकाज की निरंतरता बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया। प्रशासक केवल रामनामी और रूटीन कार्य ही कर सकेंगे, नीतिगत फैसले के लिए डीएम की अनुमति जरूरी होगी। ओबीसी आरक्षण का मामला 19 जुलाई को फिर जिला पंचायतों का 11 जुलाई को खत्म होने पर उन्हें भी प्रशासक नियुक्त किए जाने की संभावना बढ़ी।

सरकार का तर्क है कि परिसीमन पूरा करने में कम से कम छह माह का समय लगेगा। वहीं विपक्ष का आरोप है कि भाजपा पंचायत चुनावों में प्रभाव का प्रदर्शन कर विधानसभा सीटों के बंटवारे से पहले अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। अब सबकी नजर आयोग की रिपोर्ट और कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी है, जिससे तय होगा कि ‘प्रधान जी’ कब तक लगे रहेंगे और जनता कब अपने नए प्रतिनिधि चुनेगी।राजनीतिक मामलों के जानकार और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे डा. शिवानंद पांडेय कहते हैं, “पंचायत चुनाव समय पर होते तो विपक्ष को ग्रामीण असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने का अवसर मिलता। भाजपा के सहयोगी दल भी पंचायत चुनावों में प्रभाव का प्रदर्शन कर विधानसभा सीटों के बंटवारे से पहले सौदेबाजी की स्थिति मजबूत कर सकते थे।”

पांडेय ने कहा कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हमेशा विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना जाता है। उसके नतीजे ग्रामीण राजनीतिक रुझानों का बड़ा संकेत देते हैं। यदि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव से ठीक पहले होते और सपा-बसपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती, तो उसका मनोबल पर असर विधानसभा चुनावों में पड़ सकता है।

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