
लखनऊ, 17 जून। उत्तर प्रदेश में कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके घड़ियाल आज अंतरराष्ट्रीय पहचान बन चुके हैं। घड़ियाल पुनर्वास केन्द्र, कुकरैल के सफल प्रजनन ने पूरी दुनिया को घड़ियाल संरक्षण के सफल भारतीय मॉडल के रूप में अपने आप को साबित किया। यहां के संरक्षित घड़ियाल अमेरिका, जापान जैसे अनेक देशों और भारत के विभिन्न प्रदेशों में आकर्षण के केंद्र बन रहे हैं। वन्यजीव प्रेमियों के घूमने के लिए यह शानदार गंतव्य है। इसके अतिरिक्त घड़ियालों को चम्बल, दुधवा, कतर्नियाघाट, हस्तिनापुर, महराजगंज, बहराइच तथा बाराबंकी की नदियों में देखा जा सकता है।वर्ष 1970 के सर्वेक्षण में पूरे देश में मात्र 250 से 300 घड़ियाल ही बचे थे। तेजी से घटती संख्या ने वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी थी। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश ने घड़ियाल संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाते हुए वर्ष 1975 में लखनऊ के कुकरैल में घड़ियाल पुनर्वास केन्द्र की स्थापना की। संरक्षण कार्यक्रम के प्रारंभिक चरण में चम्बल नदी, इटावा से घड़ियालों के अंडे लाकर कुकरैल में हैचिंग कराई गई। वैज्ञानिक देखरेख और अनुकूल वातावरण के कारण इन अण्डों से निकले बच्चों ने घड़ियाल संरक्षण की नई कहानी लिखनी शुरू की।
आज कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र में 466 घड़ियाल मौजूद हैं। प्रतिवर्ष लगभग 140 से 160 नए घड़ियाल बढ़ रहे हैं। इसकी सफलता को देखते हुए नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी ने इसे ‘मोस्ट सक्सेसफुल कंजरर्वेशन प्रोजेक्ट इन इंडिया’ की रेटिंग दी है।कुकरैल में पले-बढ़े घड़ियाल केवल भारत के विभिन्न राज्यों तक ही सीमित नहीं रहे। यहां से भूटान, पाकिस्तान, जापान और अमेरिका के न्यूयॉर्क तक घड़ियाल भेजे गए हैं। यह उपलब्धि दर्शाती है कि उत्तर प्रदेश का संरक्षण मॉडल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया जा चुका है।
वर्ष 1976 में जन्मे घड़ियालों को ‘मदर स्टॉक’ के रूप में विकसित किया गया। वर्ष 1988 से बंदी प्रजनन (कैप्टिव ब्रीडिंग) के माध्यम से प्राप्त अंडों की हैचिंग कराई जा रही है। बच्चों की लगभग ढाई वर्ष तक देखभाल के बाद उन्हें प्राकृतिक आवास वाली नदियों में छोड़ा जाता है।कुकरैल में तैयार किए गए घड़ियालों को गंगा, घाघरा, गेरूआ, चम्बल और गंडक जैसी नदियों में छोड़ा जाता है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक आवासों में घड़ियालों की संख्या बढ़ाना और नदियों के पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत करना है।
घड़ियाल पुनर्वास केन्द्र में म्यूजियम, इंटरप्रिटेशन सेंटर, घड़ियाल मॉडल, पेयजल, शौचालय और विश्राम हेतु बेंच जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। प्रतिवर्ष लगभग दो लाख घरेलू और 100 से अधिक विदेशी पर्यटक यहां पहुंचकर घड़ियाल संरक्षण की इस अनूठी यात्रा को करीब से देखते हैं।कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुका घड़ियाल आज उत्तर प्रदेश की धरती से निकलकर दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुका है। कुकरैल पुनर्वास केन्द्र की सफलता यह साबित करती है कि वैज्ञानिक संरक्षण, सतत प्रयास और दूरदर्शी योजना के बल पर किसी भी संकटग्रस्त प्रजाति को नया जीवन दिया जा सकता है।
इनमें प्रमुख स्थल हैं राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य, दुधवा नेशनल पार्क और कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य, हस्तिनापुर के साथ ही महराजगंज बाराबंकी की नदियां, जहां घड़ियाल अच्छी-खासी संख्या में पाए जाते हैं। इन स्थलों पर घड़ियाल के साथ-साथ अन्य वन्यजीव भी देखे जाते हैं।हिन्दू धर्मग्रंथों में देवी गंगा का वाहन ‘मकर’ यानी मगरमच्छ का उल्लेख मिलता है, जो जलीय प्राणियों में सर्वाधिक शक्तिशाली और परम वेगवान माना गया है। ये संतुलित और कार्यशील पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि ‘ईको पर्यटन के दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश महत्वपूर्ण राज्य है। विश्व में जो वन्यजीव दुर्लभ हैं वे उत्तर प्रदेश में उपलब्ध है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण घड़ियाल है। राज्य में घड़ियालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। देश-विदेश से पर्यटक घड़ियालों को देखने उत्तर प्रदेश आ रहे हैं।’संजय कुमार बिश्वाल , वन संरक्षक, लुप्तप्राय परियोजना, उप्र, लखनऊ ने बताया कि ‘भारत सरकार की नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत इस वर्ष 500 घड़ियाल अंडों को प्राकृतिक आवास से लाकर कुकरैल में हैच कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इससे भविष्य में घड़ियालों की संख्या में और वृद्धि होने की उम्मीद है।’