जब गांधी टोपी राष्ट्रपति भवन से विदा हो गई…

जब गांधी टोपी राष्ट्रपति भवन से विदा हो गई…

नयी दिल्ली 18 अगस्त । देश के नौवें राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने जब आखिरी बार 1997 में राष्ट्रपति भवन छोड़ा तो उनके साथ केवल निजी सामान नहीं था। उनके साथ वह सादी सफेद गांधी टोपी भी थी जो खादी, सादगी, स्वदेशी भावना, स्वतंत्रता आंदोलन और देशभक्ति की पहचान रही है। यह कोई भव्य विदाई का प्रतीक नहीं था बल्कि उनके जीवन और व्यक्तित्व का सहज हिस्सा था, जिसे उन्होंने पद से हटने के बाद भी उसी तरह अपनाए रखा।

भोपाल में 19 अगस्त 1918 में जन्मे डॉ. शर्मा की जयंती के अवसर पर उनके राष्ट्रपति पद को केवल औपचारिक तस्वीरों और राजकीय आयोजनों के संदर्भ में याद करना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी राजनीतिक यात्रा और सार्वजनिक जीवन इस बात पर विचार करने का अवसर देते हैं कि उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को किस तरह प्रभावित किया, जिसकी संस्थागत छाप सुर्खियां समाप्त होने के बाद भी बनी रही।

डॉ. शर्मा संभवतः भारत के अंतिम राष्ट्रपति रहे, जिन्होंने पद पर रहते हुए गांधी टोपी को नियमित रूप से पहना। उनसे पहले डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद, बी.डी. जत्ती और नीलम संजीव रेड्डी जैसे राष्ट्रपतियों के परिधान का यह स्वाभाविक हिस्सा रही थी। उस पीढ़ी के लिए गांधी टोपी महज अतीत की याद नहीं थी। यह स्वतंत्रता संघर्ष की जीवंत स्मृति थी और उसे पहनने वाले कई नेताओं ने स्वयं उस दौर को देखा और जिया था।

डॉ. शर्मा के साथ इस परंपरा का लगभग मौन अंत आज 29 साल बाद भारत के अपने संस्थापक प्रतीकों के साथ बदलते रिश्ते की ओर संकेत करता है लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या आज भी विद्वान और बौद्धिक व्यक्तित्व लोकतांत्रिक संस्थाओं को उसी तरह दिशा दे सकते हैं, जिस तरह शुरुआती दौर के विद्वान राजनेताओं ने दी थी।

राष्ट्रपति पद तक पहुंचने से बहुत पहले डॉ. शर्मा ने अकादमिक और कानूनी क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई थी। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययन किया और बाद में कैम्ब्रिज में कानून की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय और लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्यापन किया तथा कानून के क्षेत्र में गंभीर विद्वान के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की। सार्वजनिक जीवन में आने से पहले ही उन्होंने अध्ययन, अध्यापन और कानून के जरिए अपनी बौद्धिक नींव मजबूत कर ली थी।

कानून की शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को एक खास दृष्टिकोण दिया। 1996 और 1997 के राजनीतिक अस्थिरता के दौर में राष्ट्रपति के रूप में सरकार बनाने के लिए दलों को आमंत्रित करने जैसे संवैधानिक निर्णयों में उनका यह संतुलित दृष्टिकोण दिखाई दिया। इससे पहले वह कई राज्यों के राज्यपाल और केंद्र में मंत्री भी रह चुके थे, जहां उन्हें अपने अकादमिक अनुभव को प्रशासन की व्यावहारिक चुनौतियों के साथ जोड़ने का अवसर मिला।

डॉ. शर्मा के दौर को केवल स्वर्णिम युग बताकर बात खत्म कर देना सही नहीं होगा। शुरुआती दशकों में विद्वान राजनेताओं की मौजूदगी उस समय की राजनीतिक संस्कृति से भी जुड़ी थी, जब स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति ताजा थी और बौद्धिक विश्वसनीयता तथा सार्वजनिक विश्वास को राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और डॉ. शर्मा जैसे व्यक्तित्वों से अपेक्षा थी कि वे ज्ञान और सार्वजनिक जिम्मेदारी, दोनों को साथ लेकर चलें।

गांधी टोपी ने डॉ. शर्मा को गंभीर व्यक्ति नहीं बनाया था। उनके दशकों के अध्ययन, कानूनी अनुशासन और संवाद के प्रति सम्मान ने उन्हें वह व्यक्तित्व दिया था। टोपी केवल उस आंतरिक अनुशासन का बाहरी संकेत थी। जब वह 1997 में राष्ट्रपति भवन से उनके साथ बाहर गई तो वास्तव में केवल खादी का एक टुकड़ा नहीं निकला था बल्कि अध्ययन, संयम और विचार की वह परंपरा भी साथ गई थी, जिसका वह प्रतीक थी।

डॉ. शर्मा की जयंती पर शायद यही सबसे महत्वपूर्ण विरासत है, सिर पर पहनी गई टोपी नहीं, बल्कि उसके नीचे मौजूद वह मन, जिसने सत्ता से पहले वर्षों तक ज्ञान और विचार के साथ अपना रिश्ता बनाया था। लोकतंत्र को केवल करिश्माई नेतृत्व और त्वरित निर्णयों की जरूरत नहीं होती, उसे ऐसे लोगों की भी जरूरत होती है। ऐसे लोग आज भी हमारे बीच हैं, सवाल सिर्फ इतना है कि क्या उन्हें लोकतांत्रिक संस्थाओं के शीर्ष तक पहुंचने की जगह मिली है।

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