खाड़ी देशों के समर्थन से सैन्य कार्रवाई वैध नहीं हो जाती , ईरान ने अमेरिकी हमले की वैधता पर उठाये सवाल

खाड़ी देशों के समर्थन से सैन्य कार्रवाई वैध नहीं हो जाती , ईरान ने अमेरिकी हमले की वैधता पर उठाये सवाल

नयी दिल्ली/तेहरान, 22 अगस्त । ईरान ने अमेरिकी-इजरायली सैन्य हमलों की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आत्मरक्षा के दावों को बदले की कार्रवाई का ‘लाइसेंस’ नहीं बनाया जा सकता।ईरान ने आरोप लगाया कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मेजबानी करने वाले खाड़ी देशों ने इस अभियान के लिए साजो-सामान और अन्य सहायता मुहैया करायी है।

ब्रिक्स लीगल सम्मेलन में ईरान का प्रतिनिधित्व करने वाले नौ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 51 केवल सुरक्षा खतरे के दावों के आधार पर किसी भी देश को सैन्य कार्रवाई शुरू करने का असीमित अधिकार नहीं देता है। इसके अलावा बल का प्रयोग तभी किया जा सकता है जब वह आवश्यकता, आसन्न खतरे और आनुपातिकता की सख्त कसौटियों पर खरा उतरता हो।इस बीच नयी दिल्ली में ईरान संघर्ष के कानूनी पहलुओं पर आयोजित एक चर्चा के दौरान प्रतिनिधिमंडल के नेता और ‘सेंटर फॉर अटॉर्नीज ऑफ द ज्यूडिशियरी ऑफ ईरान’ के प्रमुख डॉ. हसन अब्दुलियानपुर ने आरोप लगाया कि अमेरिकी ठिकानों की मेजबानी करने वाले खाड़ी देशों ने अमेरिकी सैन्य अभियान का पूरा समर्थन किया। उन्होंने कहा कि ईरान इस संलिप्तता के मामलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा सकता है।

उन्होंने कहा, “कानूनी दृष्टिकोण से मैं कह सकता हूं कि ईरान इस मुद्दे को देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय मंचों, दोनों जगह उठायेगा।” उन्होंने यह भी कहा कि ईरान अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कानूनी विकल्पों की तलाश करेगा।ईरानी प्रतिनिधिमंडल की यह टिप्पणी इस व्यापक तर्क के बीच आयी है कि अमेरिकी-इजरायली सैन्य कार्रवाई को केवल आत्मरक्षा के दावों के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। श्री अब्दुलियानपुर ने इस बात पर जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत बल का प्रयोग अपवाद है, न कि कोई सामान्य अधिकार। उन्होंने कहा, “आत्मरक्षा की आड़ में सजा देने का कानूनी लाइसेंस नहीं मिल जाता। यह बदले की कार्रवाई का लाइसेंस नहीं है, न ही यह आम नागरिकों को सामूहिक पीड़ा पहुंचाने का कोई अधिकार देता है।”

अपने खाड़ी पड़ोसियों की भूमिका पर श्री अब्दुलियानपुर ने कहा कि इसके बावजूद ईरान उनके साथ शांतिपूर्ण संबंधों के लिए प्रतिबद्ध है और यदि संबंध सामान्य होते हैं तो वह ‘अन्य देशों को माफ कर सकता है’। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) बल के प्रयोग पर व्यापक प्रतिबंध लगाता है, जबकि अनुच्छेद 51 सशस्त्र हमले के जवाब में आत्मरक्षा के अधिकार को स्वीकार करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहां अग्रिम आत्मरक्षा का तर्क दिया जाता है, वहां भी कानूनी मापदंड बहुत कठिन होते हैं।श्री अब्दुलियानपुर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस तर्क पर सवाल उठाये, जिसमें खुफिया जानकारियों के हवाले से कहा गया था कि ईरान अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर हमले की तत्काल तैयारी कर रहा था। उन्होंने कहा कि इसके लिए शत्रुतापूर्ण इरादे का स्पष्ट प्रमाण, हमला करने की वास्तविक व तत्काल क्षमता और बल प्रयोग के अलावा कोई अन्य व्यावहारिक विकल्प न होना आवश्यक है।

श्री अब्दुलियानपुर ने कहा कि ईरान के दीर्घकालिक इरादों के बारे में व्यापक चिंताएं या भविष्य की संभावित कार्रवाइयों के बारे में अटकलें खुद-ब-खुद आत्मरक्षा के कानूनी परीक्षण को पूरा नहीं कर सकतीं। उन्होंने यह भी कहा कि ओमान के माध्यम से ईरान की कूटनीतिक बातचीत यह सवाल खड़ा करती है कि क्या सैन्य बल का प्रयोग वास्तव में अनिवार्य था।उन्होंने कहा कि केवल किसी देश के सैन्य कार्रवाई को आवश्यक घोषित कर देने भर से इसकी अनिवार्यता साबित नहीं हो जाती। इस आकलन में अभियान के उद्देश्य, जिसे रोकने के लिए हमला किया गया और क्या इस्तेमाल किये गये साधनों का उस रक्षात्मक उद्देश्य के साथ कोई वास्तविक कानूनी संबंध था— इन सभी बातों पर विचार किया जाना चाहिए।

आनुपातिकता के सिद्धांत पर उन्होंने कहा कि इसके लिए हथियारों या हताहतों की संख्या में बराबरी की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यह वैध रक्षात्मक उद्देश्य, इस्तेमाल किये गये साधनों, अभियान के पैमाने और अपेक्षित सैन्य लाभ के बीच तर्कसंगत संतुलन की मांग करता है।भारत स्थित ईरान कल्चर हाउस के प्रमुख फरीदुद्दीन फरीद अस्र ने बताया कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल कानूनी विशेषज्ञों की ब्रिक्स बैठक में भाग लेने नयी दिल्ली आया था और इस संघर्ष के कानूनी पहलुओं की समीक्षा के लिए एक अलग चर्चा आयोजित की गयी थी।

इस चर्चा में संघर्ष के मानवीय परिणामों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें आम नागरिकों की मौतें, घरों, विद्यालयों और अस्पतालों को पहुंचा नुकसान तथा परिवारों व चिकित्सा सुविधाओं पर पड़ा असर शामिल था। वक्ताओं ने इस बात पर भी सवाल उठाये कि क्या धार्मिक या राजनीतिक हस्तियों का प्रमुख होना अपने आप में उन्हें कानूनी सैन्य निशाना बना देता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल राजनीतिक या धार्मिक हैसियत किसी को सैन्य निशाना बनाने का आधार नहीं बन सकती।प्रतिनिधिमंडल का मुख्य तर्क यह था कि आत्मरक्षा के दावों को केवल किसी देश के राजनीतिक या सुरक्षा आकलन के आधार पर स्वीकार करने के बजाय, अंतरराष्ट्रीय कानून—विशेष रूप से आवश्यकता, भेद (नागरिक और सैन्य में अंतर) और आनुपातिकता के सिद्धांतों के तहत कड़ी जांच के दायरे में रखा जाना चाहिए।

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