
मिर्जापुर 31अगस्त । विंध्य क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी मां विंध्यवासिनी देवी का जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया गया। जहां एक तरफ देवी के परिसर में कजली के स्वरों में मां की अभ्यर्थना की गई जिसमें भारी संख्या में लोग जुटे वहीं दूसरी ओर नगर क्षेत्र में कजली महोत्सव के साथ मां विंध्यवासिनी की झांकी निकाली गई जिसमें हजारों लोग ने पूरे नगर का भ्रमण कर मां के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। मां देवी का एक नाम कज्जला भी है। स्थानीय मान्यता है कि कज्जला देवी के जन्मोत्सव पर गायन बाद में कजली के नाम से लोक संस्कृति एवं वर्षागीत के रूप में विख्यात हुई।लोक मान्यता है कि देवी का प्राकट्य कजली पर्व के पूर्व संध्या में हुआ था। इसीलिए इस दिन को जगरन के रूप में मान्यता मिली। इस रात्रि में लोग जागकर मां का जन्मोत्सव मनाते हैं।सारी रात गांव के चौपालों से लेकर हाट बाजार में भी कजली गायी जाती है। महिलाओं द्वारा परम्परागत कजली और ढुनमुनिया नृत्य के साथ कजली का मुख्य आकर्षण रहता रहा है।इसकी प्रसिद्धि का एक नमूना है कि जगरन की कजली देखने व सुनने के लिए काशी नरेश की उपस्थिति अनिवार्य थी। कजली संयोग और वियोग दोनों की होती रही है।
कजली के जानकार बृजदेव पाण्डे कहते हैं कि वर्षा और कजली दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।बर्षा के बगैर कजली की कल्पना नही की जा सकती। उन्होंने बताया कि मां विंध्यवासिनी के अभ्यर्थना के लिए शुरु हुई कजली के स्थानीय लोक संस्कृति बनने तक कथ्य में काफी परिवर्तन हुआ है। साहित्य की कजली अखाड़ों की कजली और लोक की कजली के स्वरों और धुनों में बहुत अन्तर है।हालांकि अब वह स्थिति नही है।न ही चौपालों पर कजली के स्वर सुनाई पड़ती है नही झुले पर।अब रस्म अदायगी के तौर पर कजली महोत्सव के नाम पर हाल में आयोजन कर कजली को जिंदा रखने का असफल प्रयास किए जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों वही है,।स्थान भी वही है।वर्षा खुब हो रही है।पर न वह रौनक है। न ही इस लोक संस्कृति को बचाने की जिजीविषा है।सारा दोष सोशल मीडिया पर मढ़ दिया जा रहा है।अगर यही स्थिति रही तो देश विदेश में अपने विशेष सुर और धुन के लिए मशहूर कजली इतिहास का विषय न जाये। आवश्यकता है कि कजली को पुनर्स्थापित करने के लिए लोग आगे आएं। सरकार का मुखापेक्षी होना। इसका कोई हल नही है।