
नयी दिल्ली, 02 सितंबर। सहकारी चीनी मिलों के महासंघ का कहना है कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है और फैक्ट्री गेट पर कीमतों में गिरावट के बावजूद उपभोक्ताओं को उसका लाभ नहीं मिलने का कारण बिचौलिये हैं।’नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज’ के अध्यक्ष हर्षवर्धन पाटिल ने यहां एक कार्यक्रम से इतर समाचार एजेंसी ‘यूनीवार्ता’ के प्रश्न के उत्तर में यह बात कही। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में चीनी की कीमतों में 18-19 प्रतिशत की गिरावट आयी है। अब फैक्ट्री गेट पर (मिल जिस दर पर बिक्री करते हैं) चीनी की कीमत 45-46 रुपये प्रति किलोग्राम है।
यह पूछे जाने कि उपभोक्ता मामले विभाग के आंकड़ों के अनुसार, देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत अभी 62 रुपये और थोक कीमत 58 रुपये प्रति किलोग्राम है, श्री पाटिल ने कहा, “मिल से 45-46 रुपये बिकने वाली चीनी पर परिवहन और दूसरे खर्च मिलाकर उपभोक्ताओं को यह चीनी 50 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास मिलनी चाहिये। यदि बाजार में दाम इससे अधिक हैं तो निश्चित रूप से इसके पीछे बिचौलियों का हाथ है।”ग्रीन एनर्जी सेमीनार में हिस्सा लेने के लिए यहां आये श्री पाटिल ने एथेनॉल को सरकार द्वारा दिये जा रहे प्रोत्साहन का बचाव करते हुए कहा कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है, इसकी किल्लत पैदा की गयी थी।
एक तरफ चीनी मिलों के संगठन दाम बढ़ने के लिए बिचौलियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं तो दूसरी तरफ सरकार की जांच में कुछ चीनी मिलों में घोषित स्टॉक से ज्यादा चीनी रखने का पता चला था। सरकार ने भी 28 अगस्त को दावा किया था कि देश में चीनी की कमी नहीं है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था, “कई मामलों में चीनी मिलों उनके द्वारा सरकार को प्रस्तुत मासिक विवरणियों में घोषित मात्रा से अधिक भंडार पाया गया। इस अभियान से यह स्पष्ट हुआ है कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है।”मिलों द्वारा सीमा से अधिक चीनी रखने के सवाल को टालते हुए श्री पाटिल ने कहा कि नया पेराई सीजन शुरू होने वाला है इससे कीमतों में और गिरावट आने की संभावना है।
एथेनॉल से वाहनों को नुकसान के बारे में पूछे जाने पर श्री पाटिल ने कहा कि ई-10 ईंधन के लिए डिजाइन किये गये वाहनों को इससे कुछ नुकसान की सूचना है लेकिन ई-20 वाहनों को कोई नुकसान नहीं है। उन्होंने कहा कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से एक तरफ किसानों का फायदा हो रहा है तो दूसरी तरफ पेट्रोलियम आयात कम होने से विदेशी मुद्रा की बचत भी हो रही है। साथ ही पर्यावरण को भी फायदा हो रहा है।