
गाजीपुर, 24 सितंबर। राजनीति में विरासत जितनी बड़ी होती है, अपनी अलग पहचान बनाने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी होती है। किसी स्थापित राजनीतिक व्यक्तित्व का पुत्र होना शुरुआती परिचय जरूर दे सकता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में आगे की पहचान व्यक्ति के अपने काम, व्यवहार और जनसरोकार से तय होती है। गाजीपुर की राजनीति में अभिनव सिन्हा भी इन दिनों इसी संक्रमण के दौर में नजर आ रहे हैं।
एक ओर उनके पिता मनोज सिन्हा की बड़ी राजनीतिक विरासत है, जिन्होंने गाजीपुर की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई, केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और बाद में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल का संवैधानिक दायित्व निभाया। दूसरी ओर अभिनव सिन्हा पिछले कुछ वर्षों से पिता की राजनीतिक छाया से अलग अपनी सामाजिक पहचान बनाने के प्रयास में गांव-गांव लोगों के बीच नजर आ रहे हैं।
यही यात्रा अब 26 से 28 सितंबर तक गाजीपुर के ऐतिहासिक लंका मैदान में प्रस्तावित वृहद निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर के साथ एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचती दिखाई दे रही है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मनोज सिन्हा ने गाजीपुर सीट से समाजवादी पार्टी की शिवकन्या कुशवाहा को 32,452 मतों से पराजित किया था। उन्हें 3,06,929 मत मिले थे। केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद उन्हें रेल राज्य मंत्री बनाया गया और बाद में संचार मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार भी सौंपा गया।
गाजीपुर के लिए यह केवल एक सांसद के केंद्रीय मंत्री बनने की घटना नहीं थी, बल्कि क्षेत्र के राजनीतिक कद में वृद्धि के रूप में भी इसे देखा गया। मनोज सिन्हा की सादगी, धोती-कुर्ते की पहचान और विकास से जुड़े मुद्दों पर सक्रियता ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। उनके राजनीतिक जीवन की एक विशेषता यह भी रही कि परिवार की प्रत्यक्ष राजनीतिक सक्रियता सार्वजनिक जीवन में प्रमुखता से नजर नहीं आई। गाजीपुर में लोग अपनी समस्याओं को उनके प्रतिनिधियों और भाजपा कार्यकर्ताओं के माध्यम से उठाते रहे।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में गाजीपुर का राजनीतिक समीकरण बदला। मनोज सिन्हा को 4,46,690 मत मिले, जबकि बसपा प्रत्याशी अफजाल अंसारी को 5,66,082 वोट मिले और सिन्हा 1,19,392 मतों से चुनाव हार गए। अगस्त 2020 में मनोज सिन्हा को जम्मू-कश्मीर का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया। इसके बाद गाजीपुर की सक्रिय राजनीति से उनका प्रत्यक्ष जुड़ाव स्वाभाविक रूप से कम हुआ।
यहीं से अभिनव सिन्हा के सार्वजनिक जीवन का अगला अध्याय सामने आता है। अभिनव सिन्हा के सामने एक आसान रास्ता पिता की राजनीतिक विरासत के सहारे आगे बढ़ने का था, जबकि दूसरा रास्ता उसी विरासत को साथ रखते हुए अपनी अलग पहचान बनाने का। पिछले कुछ वर्षों की उनकी गतिविधियों से संकेत मिलता है कि उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया है।
वर्ष 2020 के बाद गाजीपुर के सामाजिक जीवन में उनकी सक्रियता बढ़ी। गांवों में लोगों से मुलाकात, पारिवारिक और सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी, लोगों का हालचाल जानना तथा भाजपा के संगठनात्मक कार्यक्रमों में शामिल होना उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनता गया।
इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले अभिनव जब गांवों की चौपालों तक पहुंचते हैं तो स्वाभाविक रूप से उनकी तुलना पिता से भी होती है। हालांकि उनकी अपनी राजनीतिक दिशा और भविष्य का स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है। पिछले चार-पांच वर्षों में उनकी गतिविधियां शहर तक सीमित नहीं रही हैं और वह जिले के विभिन्न हिस्सों में लोगों से संपर्क करते रहे हैं। ऐसे में 26 से 28 सितंबर तक लंका मैदान में प्रस्तावित स्वास्थ्य शिविर को उनकी सामाजिक सक्रियता के अब तक के बड़े सार्वजनिक आयोजनों में एक माना जा रहा है।
सेवा संकल्प अभियान के तहत प्रस्तावित इस शिविर में विभिन्न प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा निःशुल्क परामर्श और उपचार उपलब्ध कराने की योजना है। गंभीर और सर्जरी की आवश्यकता वाले मरीजों के लिए आगे उपचार की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। अभिनव सिन्हा के अनुसार शिविर में हृदय रोग, न्यूरोलॉजी, हड्डी एवं जोड़, महिला रोग, बाल रोग, नेत्र, ईएनटी, त्वचा और दंत रोग समेत विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध रहेंगे। सर्जरी के लिए चिन्हित मरीजों के लिए 27 सितंबर से एक अक्टूबर तक मेडिकल कॉलेज में उपचार की व्यवस्था किए जाने की बात भी कही गई है।
इस आयोजन की सफलता केवल चिकित्सकों की उपलब्धता से नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में लोगों तक सेवा पहुंचाने की व्यवस्था से भी जुड़ी है। मरीजों को शिविर तक लाना, पंजीकरण, जांच, परामर्श और गंभीर मरीजों के आगे के उपचार की व्यवस्था करना आयोजकों के लिए बड़ी संगठनात्मक चुनौती होगी। यही कारण है कि लंका मैदान का आयोजन अभिनव सिन्हा के लिए केवल स्वास्थ्य शिविर नहीं, बल्कि उनकी संगठन क्षमता और लोगों से जुड़ाव को परखने का अवसर भी माना जा रहा है।
मनोज सिन्हा का नाम अभिनव के लिए बड़ी सामाजिक पहचान है। लेकिन राजनीतिक परिवार की अगली पीढ़ी के सामने हमेशा यह सवाल रहता है कि वह विरासत का विस्तार बनती है या अपनी स्वतंत्र पहचान कायम करती है। अभिनव के सामने भी यही चुनौती है। क्या लोग उन्हें केवल मनोज सिन्हा के पुत्र के रूप में देखेंगे या आने वाले समय में उनके अपने काम, कार्यशैली और जनसरोकार भी उनकी पहचान का हिस्सा बनेंगे? इसका उत्तर किसी घोषणा या प्रचार से नहीं, बल्कि लगातार जनता के बीच सक्रियता से मिलेगा।
गाजीपुर की राजनीति में समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदलते रहे हैं। 2014 में मनोज सिन्हा की जीत, 2019 में उनकी हार और 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम इस बात के उदाहरण हैं कि मतदाताओं का निर्णय स्थायी नहीं माना जा सकता।
इसलिए लंका मैदान के आयोजन को अभिनव सिन्हा के राजनीतिक भविष्य की शुरुआत मान लेना फिलहाल जल्दबाजी होगी। इसे एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता के बड़े सार्वजनिक सेवा आयोजन के रूप में देखना अधिक उचित होगा। हालांकि यह आयोजन उन्हें अपने काम को जनता के बीच परखने, संगठनात्मक क्षमता दिखाने और अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर जरूर देता है।
मनोज सिन्हा ने गाजीपुर से राष्ट्रीय राजनीति तक अपनी पहचान बनाई। अब अभिनव सिन्हा के सामने चुनौती अपने पिता की तरह बनने की नहीं, बल्कि अपने काम से अपनी पहचान स्थापित करने की है। लंका मैदान में तीन दिनों तक चलने वाला स्वास्थ्य शिविर इस सवाल का अंतिम उत्तर तो नहीं देगा, लेकिन उनकी सार्वजनिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण अध्याय जरूर जोड़ सकता है।
सं प्रदीप
वार्ता