
कानपुर, 24 अक्टूबर । कार्डियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (उत्तर प्रदेश चैप्टर) के तत्वावधान में एलपीएस इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी, कानपुर के हृदय रोग विभाग की ओर से शनिवार को यहां राज्य स्तरीय सम्मेलन ‘कार्डियोप्रिवेंट 2026’ का आयोजन किया गया। ‘विज्ञान से कार्य तक: हृदय रोग रोकथाम का भविष्य’ विषय पर आयोजित सम्मेलन में विशेषज्ञों ने हृदय रोगों की रोकथाम, जोखिम कारकों की पहचान और आधुनिक उपचार पद्धतियों पर चर्चा की।सम्मेलन के नौ वैज्ञानिक सत्रों में 34 व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। इनमें लखनऊ, वाराणसी, अलीगढ़, मेरठ, नई दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और रांची समेत विभिन्न स्थानों से आए हृदय रोग विशेषज्ञों ने भाग लिया।
एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ के डॉ. सत्येन्द्र तिवारी ने एपोलिपोप्रोटीन और लिपोप्रोटीन (ए) जैसे कम चर्चित, लेकिन हृदय रोग के गंभीर जोखिम कारकों की जानकारी दी। एसजीपीजीआईएमएस की डॉ. रूपाली खन्ना ने घर पर रक्तचाप की नियमित जांच और 24 घंटे की एम्बुलेटरी ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि केवल अस्पताल या क्लिनिक में बढ़े रक्तचाप के आधार पर उपचार तय करने से बचना चाहिए, क्योंकि कुछ लोगों में ‘व्हाइट कोट हाइपरटेंशन’ की स्थिति हो सकती है।लखनऊ के डॉ. नकुल सिन्हा ने अनियंत्रित उच्च रक्तचाप के प्रबंधन के नए तरीकों पर व्याख्यान दिया, जबकि केजीएमयू के डॉ. अक्षय प्रधान ने खराब कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) को 55 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से नीचे रखने के लक्ष्य और इसके व्यावहारिक पहलुओं पर चर्चा की। सीएसआई उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष एवं एलपीएस इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी के डॉ. उमेश्वर पाण्डेय ने ‘140/90 सामान्य नहीं है’ विषय के माध्यम से उच्च रक्तचाप के प्रति सतर्कता बरतने पर जोर दिया।
एसजीपीजीआईएमएस के डॉ. नवीन गर्ग ने हृदय विफलता के आधुनिक उपचारों की जानकारी दी। वहीं, नई दिल्ली स्थित आरएमएल के डॉ. पुनीत अग्रवाल ने मोटापे और हृदय रोग के संबंध तथा जीएलपी-1 श्रेणी की नई दवाओं पर चर्चा की।विशेषज्ञों ने मोटापा, उच्च रक्तचाप, अधिक नमक का सेवन, खर्राटे और नींद संबंधी समस्याओं, गंगा के मैदानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण तथा युवाओं में बढ़ते हृदयाघात के मामलों को गंभीर चिंता का विषय बताया। जिम और मैराथन के दौरान अचानक होने वाली मौतों तथा बच्चों में रूमेटिक हृदय रोग की रोकथाम के लिए भी जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई। विशेषज्ञों ने हृदयाघात के बाद कार्डियक रिहैबिलिटेशन को प्रभावी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए भारत में इसके सीमित इस्तेमाल पर चिंता जताई।
आयोजन सचिव प्रो. (डॉ.) अवधेश शर्मा ने कहा कि भारत में हृदय रोग कम उम्र में और अधिक गंभीर रूप में सामने आ रहे हैं। समय पर रक्तचाप, रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल की जांच, स्वस्थ जीवनशैली और जागरूकता से हृदयाघात के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य नवीनतम वैज्ञानिक शोध और उपचार संबंधी जानकारी को आम मरीजों तक पहुंचाना है।सम्मेलन में संरक्षक डॉ. राकेश वर्मा, सह-अध्यक्ष डॉ. संतोष सिन्हा, संयुक्त आयोजन सचिव डॉ. एम.एम. रज़ी, कोषाध्यक्ष डॉ. मोहित सचान और वैज्ञानिक समिति के अध्यक्ष डॉ. मुकेश झा सहित प्रदेश के अनेक वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ उपस्थित रहे।