उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने सहयोगी दलों की अपेक्षाओं को साधने की चुनौती

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने सहयोगी दलों की अपेक्षाओं को साधने की चुनौती

लखनऊ, 25 अक्टूबर । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने उसके सहयोगी दलों ने सीट बंटवारे को लेकर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों से मुकाबले के साथ ही भाजपा को अब गठबंधन के भीतर अपने सहयोगियों की अपेक्षाओं को साधने की चुनौती भी दिखाई दे रही है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), निषाद पार्टी, अपना दल (एस), राष्ट्रीय लोकदल समेत अन्य सहयोगी दल आगामी चुनाव में पिछली बार की तुलना में अधिक सीटों का दावा ठोक रहे हैं।ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा ने करीब 30 सीटों को चिह्नित किए जाने की बात कही है। इनमें भाजपा की जीती हुई सीटें भी शामिल हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में सुभासपा को गठबंधन के तहत 19 सीटें मिली थीं और पार्टी ने इनमें से छह सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद से ही पार्टी अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने और आगामी चुनाव में अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटी है।

गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर भाजपा ने फिलहाल खुलकर कोई अंतिम संकेत नहीं दिया है। हालांकि पार्टी सूत्रों का मानना है कि सहयोगियों की मांगों को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।भाजपा के सामने एक ओर अपने संगठन और मजबूत दावेदारों के लिए पर्याप्त सीटें बचाए रखने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर सहयोगी दलों को साथ बनाए रखने के लिए उन्हें सम्मानजनक हिस्सेदारी भी देनी होगी।

भाजपा के वरिष्ठ सूत्रों की मानें तो आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के सहयोगी करीब 60 से 80 सीटों पर दावेदारी कर सकते हैं। इसमें भाजपा के कब्जे वाली कुछ सीटों पर सहयोगियों के प्रत्याशी उतारने की मांग भी शामिल है। गठबंधन में शामिल दल अपने-अपने सामाजिक और क्षेत्रीय प्रभाव के आधार पर सीटों का दावा मजबूत करने में जुटे हैं।सुभासपा के साथ-साथ निषाद पार्टी भी सीटों की संख्या बढ़ाने की कोशिश में है। निषाद पार्टी पहले भाजपा के साथ गठबंधन का हिस्सा रही है, लेकिन इस बार उसकी राजनीतिक स्थिति अलग है। वहीं अपना दल (एस) भी पिछली तुलना में अधिक सीटों की अपेक्षा रखता है। पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में 18 सीटों पर चुनाव लड़ा था और इनमें से 12 सीटों पर जीत हासिल की थी।

दरअसल सहयोगी दलों का जोर अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में अधिक से अधिक सीटें हासिल करने पर है। उनका तर्क है कि जिन क्षेत्रों में उनका सामाजिक आधार मजबूत है, वहां उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर मिलने से गठबंधन को फायदा होगा।राष्ट्रीय लोकदल भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक पकड़ के आधार पर अधिक सीटों की अपेक्षा रखता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा गठबंधन के साथ रहते हुए रालोद को 33 सीटें मिली थीं, जिनमें से आठ पर उसने जीत हासिल की थी।

अब राजग में शामिल होने के बाद रालोद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने प्रभाव को और मजबूत करना चाहती है। इसके लिए आगरा, अलीगढ़, मथुरा और हाथरस जैसे क्षेत्रों में भी उसकी नजर है।हाल ही में रालोद मुखिया जयंत चौधरी ने मथुरा की छपरौली विधानसभा सीट का नाम लिए बिना आगरा के किरावली में एक कार्यक्रम के दौरान सीटों की संख्या बढ़ाने की जरूरत की ओर संकेत किया था। इसे गठबंधन में पार्टी की बढ़ती दावेदारी से जोड़कर देखा जा रहा है।

अपना दल (एस) भी आगामी चुनाव में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी में है। 2022 में पार्टी ने 18 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 12 सीटें जीती थीं। पार्टी का मानना है कि उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में उसे पहले से अधिक सीटें मिलनी चाहिए।वहीं सहयोगी दलों के बीच सीटों को लेकर अपने-अपने दावे मजबूत करने की कोशिश शुरू हो चुकी है। हर दल अपने प्रदर्शन, सामाजिक आधार और पिछले चुनाव के आंकड़ों को आधार बनाकर भाजपा के सामने अपनी मांग रख रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सीटों का ऐसा संतुलन बनाना होगा, जिसमें सहयोगी दलों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले और साथ ही पार्टी अपने संगठनात्मक आधार और मजबूत दावेदारों के लिए भी पर्याप्त सीटें सुरक्षित रख सके।विपक्षी दलों से मुकाबले के लिए भाजपा को जहां बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना है, वहीं गठबंधन के सहयोगियों को एकजुट रखना भी जरूरी होगा। ऐसे में आगामी दिनों में सीट बंटवारे को लेकर बातचीत और तेज होने की संभावना है।

फिलहाल सहयोगी दल अपनी-अपनी मांगों के साथ दबाव बना रहे हैं। भाजपा की रणनीति यह तय करने पर केंद्रित होगी कि किस सहयोगी को कितनी सीटें दी जाएं और किन सीटों पर पार्टी अपने उम्मीदवार उतारे। चुनाव की घोषणा से पहले होने वाली सीटों की यह कवायद गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन की तस्वीर भी काफी हद तक साफ कर सकती है।भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अवनीश त्यागी ने कहा कि सीटों का बँटवारा कोई मुद्दा नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ नेता इन बातों को आसानी से सुलझा लेंगे जिससे सभी सहयोगियों का सम्मान भी बरकरार रहेगा।

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