चंबल मे दुलर्भ प्रजाति के कछुओं की जान की आफत

चंबल मे दुलर्भ प्रजाति के कछुओं की जान की आफत

इटावा , 10 जनवरी (वार्ता) वन विभाग की व्यापक सक्रियता के बावजूद भी उत्तर प्रदेश के इटावा स्थित चंबल इलाके से दुर्लभ प्रजाति के हजारों कछुओ को मार कर उनकी कैलोपी की तस्करी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
       अब से काफी पहले जिंदा कछुओं की तस्करी चंबल इलाके से पश्चिम बंगाल के लिए की जाती थी लेकिन कछुओ की तस्करी में जोखिम होने के कारण कछुआ की कैलोपी आसान हो गई है। कैलोपी की तस्करी में जोखिम कम है और फायदा ज्यादा है और इसी कारण तस्कर लगातार कछुआ का शिकार करने में जुटे हुए हैं।
      वन विभाग और यूपी एसटीएफ ने संयुक्त रूप से दिल्ली हावड़ा रेलमार्ग के अति महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन इटावा से एक महिला समेत दो तस्करों को बुधवार को गिरफ्तार किया है, जिनके कब्जे से तीन बैगों में भारी करीब 36 किलो कैलोपी बरामद की गई है। यह कैलोपी सेक्सुअल पावर बढ़ाने के लिए सूप बनाकर पीने के प्रयोग में ली जाती है।अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इस कैलोपी की कीमत लगभग कई करोड़ रुपये आंकी जा रही है। बरामद कैलोपी निलसोनिया, गैंगटिकस, निलसोनिया हिरउम, चित्रा इंडिका प्रजाति के कछुओं की है।
      सूत्रों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में दो लाख रुपए प्रति किलोग्राम कीमत से कैलोपी की बिक्री होती है जबकि कोलकाता में इसको मात्र 4000 रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदा जाता है। एशियाई देशों में थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया सहित कई देशों में कछुओं की केलोपी की विशेष मांग के चलते तस्करी आम बात हो गई है।
      इटावा से कछुआ कैलोपी तस्करी होने की सूचना पर प्रभागीय वानिकी निदेशक अतुल कांत शुक्ला के नेतृत्व में वन विभाग एवं कानपुर एसटीएफ ने इटावा जंक्शन पर छापामारी की। प्लेटफार्म नंबर तीन पर जोधपुर हावड़ा एक्सप्रेस ट्रेन के इंतजार में बैठी राजेन्द्री देवी एवं उसके देवर जगदीश निवासी कोकपुरा थाना फ्रेंड्स कालोनी को टीम ने घेराबंदी कर पकड़ लिया। वह कोलकाता इसे बेचने के लिए जा रहे थे। जिसे वह चार हजार रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचते हैं। इससे पहले दो बार वह लोग तस्करी कर चुके हैं।
     कछुओं की कैलोपी को वह मध्य प्रदेश, इटावा, फिरोजाबाद, आगरा एवं मैनपुरी जिलों के शिकारियों से खरीदते थे।
डीएफओ अतुल कांत शुक्ला ने बताया कि आम धारणा ऐसी मानी जाती है कि कैलोपी का शक्तिवर्धक दवाइयों में इस्तेमाल किया जाता है। तस्कर कछुआ को मारने के बाद उसका कवच उतारते हैं। उसकी खाल नहीं होती है। जिसके बाद मांस को उबाल कर चिप्स की तरह तैयार करते हैं, जिन्हें बंगाल और कोलकाता में दवा बनाने वालों को यह लोग बेचते हैं। इन दोनों पर विभागीय कार्रवाई के साथ गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई भी कराई जाएगी। सोसायटी फार कंजर्वेशन आफ नेचर के महासचिव राजीव चौहान ने बताया कि शक्तिरोधक दवा बनाने में प्रयोग होने के कारण कछुआ कैलोपी की अंतरराष्ट्रीय कीमत दो से ढाई लाख रुपये प्रति किलो है। कैलोपी बनाने में मुलायम कछुओं का प्रयोग होता है जो कि निलसोनिया गैंगटिक्स, निलसोनिया ह्यूरम एवं चित्रा इंडिया प्रजाति के कछुआ का बनता है।
         चौहान बताते हैं कि आगरा के पिनहाट और इटावा के ज्ञानपुरी और बंसरी में दो जाति ऐसी हैं जो कछुए के चिप्स बनाने का काम करती हैं । कछुए की निचली सतह जिसे प्लैस्ट्रॉन कहते हैं,को काटकर अलग कर लेते हैं । उसे कई घंटे तक पानी में उबाला जाता है । उसके बाद इस परत को सुखाकर उसके चिप्स बनाए जाते है । एक किलो वजन के कछुए में 300 ग्राम तक चिप्स बन जाते हैं । निलसोनिया गैंगटिस और चित्रा इंडिका नामक कछुए की प्रजाति से प्लैस्ट्रॉन निकाली जाती है। इटावा की नदियो और तालाब मे 11 प्रजाति के कुछए पाये लेकिन चिप्स निलसोनिया गैंगटिस और चित्रा इंडिका से ही निकाली जाती है ।
         डा चौहान का कहना है कि असल मे कछुए की चिप्स से बनने वाले सूप से इसको इस्तेमाल करने वाले के शरीर मे शारीरिक क्षमता का खासी तादात मे इजाफा होता है। सूप के इस्तेमाल के बाद सेक्स पॉवर बढ जाती है इसलिए कछुए के चिप्स का सूप सामान्य थाईलैंड,मलेशिया और सिंगापुर मे ढाई लाख रूपये मे उपलब्ध होता है । इन दोनो मे सूप के लिए इस्तेमाल किये जाने के इरादे से ही कछुओ की चिप्स को बडे पैमाने पर तस्करी करने का भी काम बदूस्तर जारी है  ।
जिंदा हालत में कछुओं की तस्करी करना बेहद खतरनाक और मुश्किल भरा मान कर के चला जाता रहा है क्योंकि जिंदा हालत में कछुओं को ले जाना पुलिस के अलावा अन्य एजेंसियों के जरिए भी पकड़े जाने का खतरा बना रहता था लेकिन अब कछुआ तस्करों ने कछुओं की चिप्स बनाकर के इसकी तस्करी का एक नया रास्ता निकाला है ।
        सबसे पहले कछुओं की चिप्स बनाए जाने का मामला साल 2000 में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में सामने आया था लेकिन तब इस बात का अंदाजा नहीं था कि कछुआ की तस्करी के बजाय उनकी चिप्स भी बना कर के इस ढंग से बाजार में उतारी जा सकती है लेकिन अब जिंदा कछुआ के बजाय कछुओं की चिप्स का कारोबार बड़े पैमाने पर चल निकला है,जो हिंदुस्तान के रास्ते होते हुए थाईलैंड,मलेशिया और सिंगापुर आदि देशों तक जा पहुंचा है। जानकार बताते है कि एक किलोग्राम चिप्स के लिए औसतन 50 से 70 कछुओं को मारा जाता है ।

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