
लखनऊ 03 दिसंबर । उत्तर प्रदेश में बिजली के निजीकरण के विरोध में बिजली कर्मचारी यूनियनों के राष्ट्रीय पदाधिकारी 11 दिसम्बर को बैठक कर आगे की रणनीति बनायेंगे।
नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रीसिटी इम्प्लॉइज एण्ड इंजीनियर्स (एनसीसीओईईई) की सोमवार रात हुई वचुअर्ल बैठक में निर्णय लिया गया कि उप्र और चंडीगढ़ में हो रहे बिजली के निजीकरण के विरोध में छह दिसम्बर को पूरे देश में सभी जिलों और परियोजना मुख्यालयों पर विरोध प्रदर्शन किये जायेंगे। एनसीसीओईईई ने यह भी निर्णय लिया कि उप्र में निजीकरण के विरोध में चल रहे संघर्ष को धार देने के लिए आगामी 11 दिसंबर को एनसीसीओईईई के सभी राष्ट्रीय पदाधिकारी लखनऊ में मीटिंग कर संघर्ष के कार्यक्रमों का ऐलान करेंगे।
बिजली कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारियों का दावा है कि निजीकरण के विरोध में चल रहे आन्दोलन को प्रतिदिन देश के विभिन्न प्रान्तों के बिजली इंजीनियरों का समर्थन मिल रहा है। कल पंजाब, उत्तराखण्ड और जम्मू कश्मीर के बिजली अभियन्ता संघों ने समर्थन दिया था तो आज झारखण्ड, महाराष्ट्र और हरियाणा के बिजली अभियन्ता संघों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर मांग की है कि निजीकरण का प्रस्ताव तत्काल वापस लिया जाये अन्यथा की स्थिति में इन प्रान्तों के बिजली कर्मी उप्र के बिजली कर्मियों का पुरजोर समर्थन करेंगे।
उधर उप्र इंजीनियर्स एसोसियेशन के महामंत्री आशीष यादव ने पावर कारपोरेशन के चेयरमैन को पत्र लिखकर यह सूचित कर दिया है कि हड़ताल होने की स्थिति में सिंचाई विभाग के अभियन्ता पॉवर कारपोरेशन में कार्य करने नहीं आयेंगे। उल्लेखनीय है कि पॉवर कारपोरेशन के चेयरमैन ने 09 सरकारी विभागों को पत्र लिखकर उनसे हड़ताल की स्थिति में अभियन्ताओं और कर्मचारियों की मांग की थी।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उप्र ने कहा है कि पॉवर कारपोरेशन द्वारा जारी किया गया एफएक्यू डॉक्यूमेंट अपने आप में निजीकरण के बाद विद्युत वितरण निगमों के कर्मचारियों की छंटनी का खुला दस्तावेज है। संघर्ष समिति ने कहा कि इस दस्तावेज में साफ तौर पर लिखा गया है कि 51 प्रतिशत हिस्सेदारी निजी क्षेत्र की होगी जिसका मतलब है कि विद्युत वितरण निगमों का सीधे निजीकरण किया जा रहा है।
यह भी लिखा गया है कि बेचे जाने वाले पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के कर्मचारियों को निजीकरण के बाद एक साल तक निजी कम्पनी में काम करना पड़ेगा। यह इलेक्ट्रीसिटी एक्ट 2003 के सेक्शन 133 का खुला उल्लंघन है क्योंकि ऊर्जा निगमों के कर्मचारी सरकारी निगमों के कर्मचारी हैं उन्हें किसी भी परिस्थिति में जबरिया निजी कम्पनी में काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।