
नयी दिल्ली, 10 जून । तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा संकट बुधवार को उस समय और गहरा गया, जब पार्टी की वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद सुस्मिता देव ने उच्च सदन से इस्तीफा दे दिया। वह दिग्गज नेता सुखेंदु शेखर रॉय के बाद एक हफ्ते के भीतर इस्तीफा देने वाली तृणमूल की दूसरी सांसद बन गयी हैं।इस घटनाक्रम ने हाल ही में मिले चुनावी झटके के बाद सुश्री बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के भीतर बढ़ते विद्रोह की अटकलों को तेज कर दिया है, जिससे संसद में बड़े राजनीतिक समीकरण बदलने की संभावना बढ़ गयी है।
जानकारी के अनुसार सुश्री देव ने उप राष्ट्रपति एवं राज्य सभा के सभापति सी पी राधाकृष्णन से मुलाकात की और सदन की सदस्यता से अपना औपचारिक इस्तीफा सौंप दिया। उनका यह इस्तीफा श्री सुखेंदु शेखर रॉय की पार्टी और राज्य सभा दोनों से इस्तीफा देने के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें उन्होंने तृणमूल के भीतर ‘बेलगाम भ्रष्टाचार’ और ‘अराजक शासन’ का हवाला दिया था।पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में काम कर रहीं सुश्री देव के इस्तीफे को तृणमूल नेतृत्व के लिए बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है, जो पहले से ही आंतरिक असंतोषों से जूझ रहा है।
महिला कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष रहीं सुश्री देव साल 2021 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुई थीं। उन्होंने सिलचर से 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन भाजपा उम्मीदवार राजदीप रॉय से हार गयी थीं।तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्हें राज्य सभा के लिए नामित किया गया और वह राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के प्रमुख चेहरों में से एक बनकर उभरीं।उनके इस्तीफे से जुड़े राजनीतिक संशय को बढ़ाते हुए बुधवार को कुछ तस्वीरें सामने आयीं, जिनमें सुश्री देव नयी दिल्ली में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से मुलाकात करती दिख रही हैं। इसने उनके भविष्य की राजनीतिक योजनाओं को लेकर अटकलों को हवा दे दी है।
इस मुलाकात के राजनीतिक मायनों पर न तो सुश्री देव और न ही भाजपा की ओर से तुरंत कोई टिप्पणी की गयी है।ये घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आये हैं, जब तृणमूल के संसदीय दल के भीतर बड़ा विद्रोह पनपने की सूचनाएं आ रही हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, तृणमूल के करीब 20 सांसद संसद में भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल होने की इच्छा जताते हुए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखने पर विचार कर रहे हैं। अभी तक ऐसा कोई औपचारिक पत्र सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन इन रिपोर्टों ने दिल्ली-कोलकाता दोनों जगह राजनीतिक सरगर्मियां तेज कर दी हैं।
इस सामूहिक दलबदल की संभावना ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी की एकजुटता पर नये सवाल खड़े कर दिये हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एक के बाद एक दो वरिष्ठ सांसदों का इस्तीफा और सांसदों के एक धड़े में असंतोष की सूचनाएं, पार्टी के भीतर गहरे संगठनात्मक संकट की ओर इशारा करती हैं।इस हफ्ते की शुरुआत में श्री सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे से तृणमूल को पहले ही बड़ा झटका लग चुका है। अपने इस्तीफे में और उसके बाद दिये सार्वजनिक बयानों में इस दिग्गज सांसद ने पार्टी नेतृत्व की तीखी आलोचना की थी और आरोप लगाया था कि संगठन के भीतर भ्रष्टाचार और मनमाना कामकाज पूरी तरह हावी हो चुका है। हालिया चुनावी झटकों के बाद उनके जाने को व्यापक स्तर पर होने वाले विद्रोह के पहले प्रत्यक्ष संकेत के रूप में देखा गया था।
तृणमूल ने अब तक इन इस्तीफों के महत्व को कम कर आंकने की कोशिश की है और उसका दावा है कि सुश्री बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी पूरी तरह एकजुट है। लगातार हुए इन इस्तीफों ने हालांकि भाजपा को एक नया हथियार दे दिया है, जो पश्चिम बंगाल में अपना प्रभाव बढ़ाने और अपनी पार्टियों से असंतुष्ट विपक्षी नेताओं को अपने पाले में लाने की कोशिशों में जुटी है।इस बदलते घटनाक्रम ने संसद में विपक्षी खेमे के भविष्य के स्वरूप पर भी सवाल खड़े कर दिये हैं। यदि तृणमूल सांसदों के एक धड़े के दलबदल की ये सूचनाएं अगर हकीकत में बदलती हैं, तो इससे विपक्ष के संख्या बल पर बड़ा असर पड़ सकता है और संसद के दोनों सदनों में राजग की स्थिति और मजबूत हो सकती है।
राष्ट्रीय स्तर पर खुद को भाजपा के मुख्य चुनौती देने वालों में से एक के रूप में पेश करने वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए ये इस्तीफे हाल के वर्षों में सबसे गंभीर आंतरिक चुनौतियों में से एक हैं।आगे और दलबदल होने की अटकलों के बीच, अब पूरा ध्यान इस बात पर है कि क्या तृणमूल नेतृत्व इस संकट को थामने में सफल रहता है या फिर यह मौजूदा गतिरोध आने वाले हफ्तों में एक बड़े राजनीतिक उलटफेर का सबब बनेगा।