
मथुरा, 11 जून । ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश के हाथरस और मथुरा में आयोजित कार्यक्रमों में गौ-संरक्षण के मुद्दे को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने देश में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग दोहराई।गौ-प्रतिष्ठा और राष्ट्रव्यापी गौ-संरक्षण आंदोलन के अंतर्गत चल रहे अपने 81 दिवसीय “गौप्रतिष्ठा धर्मयुद्ध” अभियान के 40वें दिन ब्रज क्षेत्र पहुंचे शंकराचार्य ने जनसभाओं को संबोधित करते हुए कहा कि गौ-संरक्षण के विषय में सरकारों को स्पष्ट और प्रभावी नीति अपनानी चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश से बड़े पैमाने पर बीफ का निर्यात होता है और इस विषय पर केंद्र तथा प्रदेश सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के अनुरूप गौ-संरक्षण के लिए कठोर कानून बनाए जाने की आवश्यकता है।शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम लेते हुए कहा कि गोरक्षपीठ से जुड़े होने के कारण उनसे गौ-संरक्षण के मुद्दे पर अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने नाथ संप्रदाय के गुरु गोरखनाथ की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि गाय को मातृ स्वरूप माना गया है और इस भावना का सम्मान होना चाहिए।
उन्होंने वैध और अवैध कत्लखानों के मुद्दे पर भी अपनी राय व्यक्त की। उनका कहना था कि गौ हत्या को किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता और इस विषय पर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता है।अपने संबोधन में शंकराचार्य ने कहा कि देश में कई दशकों से गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठती रही है। उन्होंने गौ-संरक्षण आंदोलन को आगे बढ़ाने का आह्वान करते हुए कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों को इस विषय पर एकजुट होकर प्रयास करना चाहिए।
ब्रजभूमि की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए उन्होंने गाय और भारतीय समाज के पारंपरिक संबंधों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि आस्था और जीवन मूल्यों का प्रतीक रही है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और गौ-संरक्षण आंदोलन से जुड़े लोग उपस्थित रहे। शंकराचार्य ने अपने अभियान के माध्यम से देशभर में गौ-संरक्षण के प्रति जनजागरण चलाने की बात कही।उल्लेखनीय है कि गौ-संरक्षण का विषय समय-समय पर सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनता रहा है। इस संबंध में विभिन्न संगठनों और विचारधाराओं के अलग-अलग मत रहे हैं। शंकराचार्य की यह टिप्पणी भी इसी व्यापक बहस के संदर्भ में देखी जा रही है।