
नयी दिल्ली 25 जुलाई। समूचा देश रविवार को 27वें कारगिल विजय दिवस पर 1999 के कारगिल युद्ध में सेनाओं के रणबांकुरों के उस साहस, वीरता और सर्वोच्च बलिदान को याद करेगा जिसने देश के सैन्य इतिहास में एक निर्णायक क्षण के रूप में अमिट छाप छोड़ी है।इस युद्ध में जांबाज भारतीय सैनिकों ने मातृ भूमि की रक्षा में प्राणों की बाजी लगाते हुए नियंत्रण रेखा से लगते क्षेत्रों में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़कर कब्जा की गयी पर्वतीय चोटियों पर तिरंगा फहरा कर अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया था। मई से जुलाई 1999 के बीच लद्दाख के कारगिल–द्रास–बटालिक क्षेत्र के दुर्गम पर्वतीय इलाकों में लड़ा गया यह युद्ध भारत में एक सफल सैन्य अभियान के रूप में याद किया जाता है।
यह संघर्ष भारत और पाकिस्तान द्वारा फरवरी 1999 में द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के उद्देश्य से लाहौर घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किये जाने के कुछ ही महीनों बाद हुआ। वर्ष 1998–99 की सर्दियों के दौरान पाकिस्तानी सेना के सैनिकों और सशस्त्र घुसपैठियों ने ‘ऑपरेशन बद्र’ के तहत नियंत्रण रेखा को पार कर राष्ट्रीय राजमार्ग 1ए (अब एनएच-1) पर नजर रखने वाली प्रमुख पर्वत-श्रृंखलाओं पर स्थित भारत की कई खाली चौकियों पर कब्ज़ा कर लिया। यह राजमार्ग श्रीनगर को लेह से जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है।आधिकारिक विवरण के अनुसार इस घुसपैठ का उद्देश्य राजमार्ग को शेष जम्मू कश्मीर से काटना, सियाचिन में तैनात भारतीय सैनिकों को अलग-थलग करना तथा नियंत्रण रेखा के साथ के क्षेत्रों में यथास्थिति को बदलना था।
इस घुसपैठ की जानकारी पहली बार 03 मई 1999 को मिली जब स्थानीय चरवाहों ने बटालिक क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों के बारे में बताया। इन रिपोर्टों की पुष्टि के लिए भेजी गयी प्रारम्भिक गश्ती टुकड़ियों का सामना 16,000 फुट से अधिक ऊंचाई पर मज़बूती से जमे भारी हथियारों से लैस घुसपैठियों से हुआ। जैसे-जैसे घुसपैठ का वास्तविक पैमाना स्पष्ट होता गया, भारत ने घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। राजनीतिक निर्णय के तहत सरकार ने नियंत्रण रेखा को पार न करने का फैसला किया भले ही इससे भारतीय सेनाओं को सामरिक दृष्टि से नुकसान उठाना पड़ा।सेना को इस दौरान अत्यंत कठिन युद्ध का सामना करना पड़ा। पाकिस्तानी सैनिक ऊंचाइयों पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर जमे हुए थे, जिससे भारतीय सैनिकों को शून्य से नीचे तापमान और ऑक्सीजन की कमी वाली परिस्थितियों में तोपखाने तथा मशीनगनों की गोलीबारी के बीच खड़ी चढ़ाई करते हुए हमला करना पड़ा। इस अभियान की विशेषता संख्यात्मक श्रेष्ठता नहीं, बल्कि पर्वतीय युद्धकला थी, जहां प्रत्येक चोटी को लगातार तोपखाने के समर्थन से अत्यंत कठिन इलाकों में पैदल सैनिकों के हमलों के बल पर दोबारा हासिल करना था।
हवाई हमले की आवश्यकता को देखते हुए भारतीय वायु सेना ने 26 मई 1999 को ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ शुरू किया। लगभग तीन दशकों में यह भारतीय वायु सेना का ऐसा पहला बड़ा युद्ध अभियान था, जिसमें नियंत्रण रेखा को पार किये बिना दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किये गये।सेना और वायु सेना के समन्वित अभियानों ने दुश्मन की रक्षा-पंक्ति को कमजोर करने तथा तोलोलिंग, प्वाइंट 5140, टाइगर हिल और प्वाइंट 4875 जैसी रणनीतिक ऊंचाइयों को दोबारा हासिल करने में निर्णायक भूमिका निभायी।
जून में लड़ी गई ‘तोलोलिंग की लड़ाई’ भारतीय सेनाओं के लिए पहली बड़ी सफलता सिद्ध हुई, जबकि जुलाई के शुरू में ‘टाइगर हिल’ पर फिर से कब्ज़ा युद्ध का वह निर्णायक मोड़ बना, जिसने परिस्थितियों को स्पष्ट रूप से भारत के पक्ष में कर दिया। बढ़ते सैन्य दबाव और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते कूटनीतिक अलगाव के बीच पाकिस्तान ने अपनी सेनाओं की वापसी की घोषणा की। भारतीय सेना ने 26 जुलाई तक शेष सभी कब्ज़ाई गयी चौकियों को मुक्त करा लिया और इस प्रकार ‘ऑपरेशन विजय’ सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।इस संघर्ष में भारत ने आधिकारिक रूप से अपने 527 सैन्य कर्मियों को खोया, जबकि 1,300 से अधिक सैनिक घायल हुए। इस युद्ध ने देश को उसके कुछ सबसे प्रतिष्ठित सैन्य नायक दिए, जिनमें कैप्टन विक्रम बत्रा, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पाण्डेय, ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव तथा राइफलमैन संजय कुमार शामिल हैं। संघर्ष के दौरान असाधारण वीरता के लिए चार सैनिकों को भारत के सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
कारगिल युद्ध ने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधारों को प्रेरित किया। सरकार ने खुफिया तंत्र, निगरानी व्यवस्था तथा उच्च रक्षा प्रबंधन की समीक्षा के लिए कारगिल समीक्षा समिति का गठन किया।इस संघर्ष के बाद सीमा निगरानी, खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय, उच्च हिमालयी क्षेत्रों के लिए विशेष उपकरणों की खरीद, सटीक मारक हथियारों, मानव रहित हवाई प्रणालियों (ड्रोन) तथा उत्तरी सीमाओं पर आधारभूत ढांचे के विकास में तेज़ी आयी।